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Bhishma Pitamah : जानिए भीष्म पितामह ने बाण लगने के बाद भी क्यों नहीं त्यागा था अपना शरीर? ये है असली वजह

हिंदू धर्म शास्त्रों में मकर संक्रांति को विशेष महत्व दिया गया है। यह त्यौहार सभी के लिए बेहद खास होता है और यह साल का पहला त्यौहार भी कहा जाता है। इस दिन गंगा स्नान का भी विशेष महत्व बताया गया है। मकर संक्रांति के दिन पूजा पाठ, जप तप, दान पूण्य अधिक करने से व्यक्ति को शुभ फलों की प्राप्ति होती है।

ऐसी मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन गंगा स्नान करने से भूल से भी किए हुए पाप धुल जाते हैं। यह सारे पापों से मुक्ति दिलाता है। इस विशेष दिन पर अपने पूर्वजों का पिंडदान करने की भी परंपरा है। इस दिन किए गए उपाय पितरों को मोक्ष दिलाता है।

मकर संक्रांति के ही पावन पर्व पर सूर्य उत्तरायण होते हैं। वह भारत में भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने के बाद अपने शरीर का त्याग किया था। भगवान कृष्ण जब अर्जुन को गीता का उपदेश दे रहे थे तो उस वक्त मार्गशिर्ष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी की तिथि थी. इस दौरान श्री कृष्ण ने बताया कि सूर्य के दक्षिणायन होने के बाद कोई व्यक्ति कृष्ण पक्ष की रात में अगर शरीर का त्याग करता है तो वह व्यक्ति चंद्रलोक में जाता है और फिर कभी मृत्यु लोक में लौटकर नहीं आता है और यह क्रम चलता रहता है। वही सूर्य के उत्तरायण होने पर शुक्ल पक्ष के दिनों में उजाले में अपने प्राण त्यागने वाले व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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हर साल मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन भीष्म अष्टमी मनाई जाती है. मान्यता है कि इस दिन भीष्म पितामह ने देह का त्याग कर दिया था. शास्त्रों में बताया गया है कि भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान था. मकर संक्रांति का त्योहार हिंदुओं में काफी महत्वपूर्ण भी है। इस दिन को पतंग उड़ाई जाती है और खिचड़ी का विशेष आनंद लिया जाता है।इस दिन के दान पुण्य का भी खास महत्व है।