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“नेहरू क्यों चाहते थे कि देश छोड़कर जाने वाले मुसलमानों के घर हिंदू को न दिया जाए” नेहरू- पटेल की चिट्ठियों से जानिए वो कहानी

हमारा देश सेकुलर है तो हिंदू के लिए या फिर मुसलमानों के लिए कोई काम अलग से कैसे किया जा सकता है बात बिल्कुल सही भी है समान रूप से सबके लिए व्यवहार होना चाहिए। पर आज आपको 1947 में जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल के बीच लिखी गई चिट्ठी उससे समझाते हैं कि धर्म देखकर काम शुरू कहां से हुआ ?

वैसे तो नेहरू और सरदार पटेल के बीच रिश्ते आजादी से पहले नरमी भरे रहें. पर आजादी के बाद तनाव भरे हो गए. उदाहरण भी बहुत मिलते हैं इसका एक उदाहरण शंकर जो पटेल के निजी सचिव है थे. उनकी किताबें निकाल कर बताते हैं. यह बात उस समय की है. जिसमें विभाजन के बाद की प्रक्रिया चल रही थी लोग पाकिस्तान से हिंदुस्तान और हिंदुस्तान से पाकिस्तान की तरफ जा रहे थे.

21 नवंबर 1947 को सरदार पटेल ने कांग्रेस के नेता के सी नियोगी को पत्र लिखा- पत्र में लिखा कि “मैंने अभी-अभी एसके कृपलानी के हस्ताक्षर वाला ऑफिस मेमोरेंडम देखा. जिसमें यह सूचित किया गया है ऐसा निर्णय हुआ कि दिल्ली के मुख्यतः मुस्लिम मोहल्ले में जो घर खाली पड़े हैं. वह गैर मुस्लिम निराश्रित को किराए से न दिया जाए बल्कि केवल मुसलमानों को ही दिया जाए ताकि अमुक मोहल्ले दिल्ली में संगठित मुसलमान मोहल्ला बन सके.

जहां तक मैं जानता हूं कि इस विषय में मंत्रिमंडल ने कोई निर्णय नहीं लिया है. यदि ऐसा कोई निर्णय किया गया है तो स्पष्ट है कि इसकी आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से व्यापक प्रतिक्रिया होगी और मुझे लगता है कि गृह मंत्री के नाते इस निर्णय पर पहुंचने से पहले इस विषय में मुझ से परामर्श किया जाना चाहिए था. पिछले उपद्रव में शहर के भीतर के बाहर अथवा शहर के बाहर मुख्यतः मुस्लिम क्षेत्रों या मुख्य हिंदुओं के खतरों और अनिष्ठा पर स्पष्ट तथा निश्चित रूप से भार दिया जा चुका है।

मैं मानता था कि इस अनुभव के बाद हम समझदार बनेंगे परंतु मुझे यह सब देखकर दुख होता है कि जिस निर्णय कि हम सब के लिए विज्ञापित की गई है वह इन खतरों को जारी रखेगा.शहर के मुख्य जातियों में पारस्परिक विश्वास तथा मैथिली भाव बढ़ाने के बदले उनकी आंखों में कांटा बन जाएगा और सारे शहर में छोटे-छोटे पाकिस्तान और हिंदुस्तान पैदा कर देगा।

आपको बता दूं कि इस लेटर की एक प्रति भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को दी गई थी. इस पर 21 नवंबर 1947 उसी दिन जवाहरलाल नेहरू ने सरदार को लेटर का जवाब भी भेजा-“शहर में संगठित मुसलमान मोहल्ले या अन्य मोहल्ले हम में से कोई भी नहीं चाहता शहर की सामान्य जनसंख्या संतुलित रूप में बड़ी होनी चाहिए. परंतु समस्या संगठित मुस्लिम मोहल्ले बनाने की नहीं थी बल्कि दिल्ली शहर के उन दो तीन क्षेत्रों में उपद्रव को फैलाने से रोकने की थी जहां अभी कुछ मुसलमान रहते हैं.

ऐसे उदाहरण मेरे सामने रखे गए हैं जिनमें मुख्य तो मुस्लिम मोहल्ले में मुसलमानों द्वारा खाली किया गया मकानों में गैर मुस्लिम आमतौर पर सीख रहने लगे हैं. तुरंत ही वंहा आने वाले और पुराने निवासियों के बीच छोटा सा झगड़ा खड़ा हुआ जो बढ़ता गया उस मोहल्ले के मुसलमानों को नए आने वाले ने धमकाया और मौजूदा हवा को देखते हुए यह मुसलमान भयभीत हो गए.

उनमें से बहुतो ने अपने घरों का छोड़कर हुमायूं और मकबरा छावनी में चले गए. जहां तक मैं हमारी नीति को समझता हूं वह यह रही है कि मुसलमानों के लिए दिल्ली शहर में रहने के लिए सुरक्षित परिस्थितियां उत्पन्न की जाए साथ ही उन मुसलमानों के लिए भी जो दिल्ली छोड़ कर गए थे और वापस दिल्ली आना चाहते हैं. अभी तक सुरक्षित है हम यह भावना काफी मात्रा में उत्पन्न करने में सफल नहीं हुए हैं.

इसका नतीजा यह हुआ कि हुमायूं का मकबरा की आबादी बढ़ गई है और अगर यह स्थिति बनी रही तो इसमें कोई शंका नहीं कि दिल्ली में रहने वाले मुसलमानों के अधिक अधिकाधिक संख्या में छोड़ने के लिए मजबूर होंगे,आप जानते हैं कि संकटकालीन समिति की बैठक में बारिश की चर्चा हुई थी।

लेटर में आगे लिखा कि-” यदि ये गैर मुसलमानों को सौंप गए तो वह संघर्ष बना रहेगा और यह छाप आप लोगों के मन पर पड़ी रहेगी कि हमें बचे हुए मुसलमानों को शहर से बाहर निकाला चाहते हैं. यह चीज हमारे अपने व्यक्त कर और कांग्रेस महासमिति की प्रतिपादित नीति का सीधा विरोध करती है उन्होंने आगे लिखा मैं आशा करता हूं कि कुछ समय बाद यह घटना ही नहीं रहेंगे और शहर में मिश्रित और संतुलित आबादी खरी की जा सकेगी.

इस बीच आज की स्थिति का सामना हमें करना ही पड़ेगा और यदि हम अपनी बात पर टिके रहना चाहते हैं तो इसके सिवाय दूसरा कोई मार्ग नहीं है कि हम मुख्यतः मुस्लिम क्षेत्रों में मुसलमानों द्वारा खाली किए गए मकान गैर मुसलमानों को देने से बचा जब मुझे यह बात बताया गया कि कुछ सीखो ने सचमुच एक मुस्लिमों पर कब्जा कर लिया है और वहां उपद्रव मचाया हुआ है. इसके फलस्वरूप पड़ोस के मुसलमान अपने मकान छोड़ रहे हैं तो मैंने अयंगर से कहा कि वह कृपलानी को सूचना दें कि इस तरह की बात को प्रोत्साहित नहीं देना चाहिए और ऐसे मुसलमान मकान दूसरों को नहीं देना चाहिए”।

इस लेटर का जवाब सरदार पटेल ने 22 नवंबर 1947 यानी दूसरे दिन नेहरू को लिखा- मेरे लिए यह कहना शायद ही जरूरी हो कि मैं कांग्रेस महासमिति की निर्धारित नीति से पूरी तरह सहमत हूं. यह बात भी मुझे पूरी तरह स्वीकार है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल को जल्दी यह सोचना चाहिए. कि हमें अपने सामने खड़ी वर्तमान परिस्थितियों में कांग्रेस महासमिति के मार्गदर्शन को कैसे अमल करना चाहिए क्योंकि मुझे इमानदारी से ऐसा लगा और अभी भी लगता है कि मुसलमानों की संगठित बस्तियों की रचना महासमिति की नीति के बिल्कुल विपरीत होगी.

इसलिए मैंने कै.सी नियोगी को इस बारे में लिखने का साहस किया. शहर में संगठित मुस्लिम बस्ती खडी करने से सुरक्षा की प्रक्रिया फिर से स्थापित नहीं होंगी. मुझे लगता है कि केवल इसी से बात को निर्णायक नहीं मान लेना चाहिए कि कुछ गलत प्रकार के लोग कुछ गलत बस्ती और मे जाकर बस गए और वहां उन्होंने दंगा फसाद किया था.उनके स्थान पर ज्यादा अच्छे लोग को हम बसा सकते थे. यह विश्वास करना भी मुझे कठिन लगता है या किसी मुस्लिम बस्ती में कुछ गैर मुसलमान ऐसी परिस्थिति कार्य कर सकते हैं.

जिससे वहां के मुसलमानों को मोहल्ला छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया जाए, मुझे ऐसा लगता है कि मुसलमान केवल मुस्लिम मोहल्लों में ही स्वयं को सुरक्षित अनुभव कर सकते हैं या मुस्लिम मोहल्लों में ही रहकर उनके भीतर सुरक्षा की भावना उत्पन्न की जा सकती है. यह कल्पना कांग्रेस महासमिति के प्रस्ताव का संभावित परिणाम नहीं हो नहीं किंतु उनका निषेध है किसी भी हालत में बाहर से मुसलमानों को दिल्ली के मोहल्ले में लाकर नहीं बसाना चाहिए.” इस विषय पर एक दूसरे के साथ पत्र व्यवहारों का यह परिणाम हुआ कि इसके बाद एक मामला आने पर अब सरदार पटेल से ऐसे मामलों पर उनको राय रूप में रखा जाने लगा नियोगी ने 25 नवंबर 1947 को सरदार को लेटर लिखकर पूछा-मृदुला साराभाई की ओर से एक पत्र मिला है.

उसे संलग्न कर रहा हूं क्योंकि वह पत्र महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करता है. पंजाब के एक जिले से काफी संख्या में मुसलमानों को दिल्ली ले जाने के बाद खराब करता है इसीलिए अगर कृपा करके इस प्रश्न पर आप विचार मुझे बताएं तो मैं आपका कृतज्ञ हो जाऊंगा. मृदुला साराभाई ने पत्र में लिखा था- जमीयत जिले से अपने कार्यकर्ता और अनुयायियों को एकत्रित करके दिल्ली में ऐसी जगह फिर से बसाना चाहते हैं. जहां उनके रिश्तेदार या मित्र हैं वे चाहते हैं कि इसके लिए उन्हें एक ट्रक दिया जाए और रास्ते में रक्षा करने वाला एक पुलिस दल भी दिया जाए.

इस पर सरदार पटेल ने 2 दिन बाद जवाब दिया- सरकार के वर्तमान नीति बिल्कुल स्पष्ट है. वह कहीं से भी किसी भी रिफ्यूजी के दिल्ली में बड़ी संख्या में आने के निश्चित ही विरुद्ध हम किसी भी संख्या में रिफ्यूजी के लिए दिल्ली आने की सुविधा नहीं दे सकते हैं,इसलिए मेरे विचार से मौलाना हकीम सरीफुद्दीन कि अपने अनुयायियों को दिल्ली में एकत्रित करने की कोशिश के साथ हमारा कोई संबंध नहीं होना चाहिए.

नियोगी को एक लेटर लिखा गया- आप के कार्यकाल को बड़ी संख्या में निराश्रित के साथ व्यवहार होता है और मैंने अक्सर आपको यह समझाया है कि आप के कार्यक्रम में ऐसे कुशल कर्मचारी रखे जो रिफ्यूजी से मिलकर बातचीत करें और अधिक नहीं तो कम से कम मानसिक शांति और संतोष अवश्य दें. आपके अधिक तो रिफ्यूजी हिंदूहोते है, परंतु खासतौर पर दिल्ली के और आंशिक रूप से पास पड़ोस के जिलों से बहुत से मुसलमान भी आप के कार्यालय में आते हैं मेरे ख्याल से उचित होगा.

यदि आप अपने कार्यालय में कुछ मुसलमानों को कम से कम इन निराश्रित उसे बातचीत करने के लिए नियुक्त करें. जो उनके पास किसी गैर मुसलमान के ज्यादा दोस्ताना ढंग से पहुंचेंगे. यह सुझाव मेरे सामने मौलाना आजाद ने रखा है और मैं इसे पुणे तो सहमत हूं मेरा सुझाव है कि ऐसे अधिकारी नियुक्त करते समय आप मौलाना आजाद से परामर्श कर सकते हैं जो समय तो आपको अनुकूल नाम सुझा सकेंगे.

सरदार पटेल को जब यह बात पता चली तो इसका जवाब उन्होंने 9 दिसंबर 1947 को नियोगी को लेटर लिख कर दिया- मैं नहीं मानता कि यह सिद्धांत स्वीकार कर सकते हैं कि किसी एक के काम के सदस्यों के साथ व्यवहार करने के लिए उसी कौन किया लोगों को नियुक्त किया जाना चाहिए. मैं मानता हूं कि छावनी में इन निराश्रितओ को देखभाल मुस्लिम कर्मचारी और अधिकारी ही करते हैं यदि आप सांप्रदायिक सिद्धांत को मानना स्वीकार करते हैं तो आपको सिखों का दावा भी स्वीकार करना होगा।

इन चिट्ठियों से पता लगता है कि हिंदू को अलग से और मुस्लिम को अलग से देखने की प्रथा आजादी के साल से ही शुरू हो गई. जबकि आजादी मिलते ही ऐसा होना था कि हिंदू मुस्लिम की बातें अलग से उठने ही नहीं थी क्योंकि आजादी से पहले ऐसी कोई बाते बहोत हो चुकी थी उन पर आजादी मिलते ही रोक लग जानी थी. आजादी के बाद तो केवल नागरिकों की बात उठनी थी लेकिन सांवलिया धार्मिक आधार पर दी जाने लगी।

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