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#KashmiriHinduExodus रातों रात अपनी जमीन को छोड़ने का दर्द वहीं जानता है जिसने इसे देखा हो

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यह तो आपको भी पता है कि साल 1990 में क्या हुआ था आतंकवाद में जैसे-जैसे पांव पसारना शुरू किया तो यह धीरे-धीरे बढ़ता ही गया और नतीजा यह सामने आया कि सभी कश्मीरी पंडितों को वहां से पलायन करना पड़ा। आतंकवाद इस कदर अपना दहशत बना चुका था कि लोगों के मन में केवल भय के अलावा और कुछ नहीं था।

वही आपको यह भी बता दें कि आतंकवाद ने इन लोगों को अपनी जमीन को रातों-रात छोड़ने पर मजबूर कर दिया, जहां मजबूरन जिसके हाथ जो लगा उसे लेकर अपने परिवार के साथ वहां से चले गए क्योंकि उस वक्त खुद की सुरक्षा और अपने परिवार की सुरक्षा सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण थी ।

हम उन लोगों का दर्द बिल्कुल भी नहीं समझ सकते, जिन्होंने अपना बचपन यहां बिताया, जहां उनके बाप दादा ने आखरी वक्त गुजारा उस जमीन को रातों-रात छोड़ने का दर्द शायद उन लोगों के अलावा कोई और नहीं समझ सकता।

आज पूरे 3 दशक हो चुके हैं पर अपनी जमीन को छोड़ने का दर्द इस प्रकार रहा है कि यह अभी भी खत्म नहीं हुआ है। पूरे भारत में 19 जनवरी को कश्मीरी पंडित विस्थापित दिवस के रुप में मनाया जाता है।

कई लोगों के दिल में तो आज भी वह भय हैं जब उन्हें अपने और परिवार की जान बचाकर भागना पड़ा था। यह दौर 90 का दशक था जब आतंकियों के निशाने पर कश्मीरी पंडित थे, जिन्हें कई बार तो आतंकियों द्वारा मस्जिदों से इन्हें अपना घर छोड़कर जाने की धमकी दी जा रही थी। इससे यह पता चलता है कि उस वक्त आतंक को लेकर किस तरह लोगों में भय की भावना थी।

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