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OPINION: आपराधिक घटनाओं को राजनीतिक व सामाजिक विवादों में क्‍यों उलझा दिया जाता है? | – News in Hindi

इन दिनों देश में जहां अचानक आपराधिक घटनाओं पर राजनीतिक प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई है वहीं इन घटनाओं पर जाहिर की जाने वाली प्रतिक्रियाओं को भी सवालों के दायरे में लाया जा रहा है. ऐसा नहीं है कि आपराधिक घटनाएं पहली बार हो रही हैं, या कि जिस प्रकृति की घटनाओं पर बवाल है, वैसी घटनाएं पहले नहीं हुई हैं. अपराध पहले भी होते रहे हैं और हर तरह के होते रहे हैं. यदि नहीं बदला तो समाज का मानस और यदि बदला है तो उन घटनाओं पर जाहिर की जाने वाली सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का स्‍वरूप.

उदाहरण के लिए उत्‍तरप्रदेश को ही लीजिये. वहां थोड़े समय के अंतराल के बाद करीब-करीब एक ही प्रृकति की दो घटनाएं हुईं. हाथरस में एक दलित युवती के साथ कथित गैंगरेप और उसके साथ बर्बर व्‍यवहार की वारदात हुई तो उसके कुछ ही दिन बाद बलरामपुर में भी एक दलित युवती के साथ वैसी ही कथित गैंगरेप और बर्बर व्‍यवहार की घटना को अंजाम दिया गया. दोनों ही घटनाओं का शिकार हुई युवतियों ने बाद में दम तोड़ दिया.

हाथरस की घटना सामने आने के बाद, आज के राजनीतिक ट्रेंड के हिसाब से कांग्रेस ने इसे मुद्दा बनाया. कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने बड़े काफिले के साथ दिल्‍ली से हाथरस तक की यात्रा की. उत्‍तरप्रदेश की भाजपा सरकार को दोषी ठहराते हुए मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ से इस्‍तीफे की मांग की गई. हाथरस की घटना को लेकर क्‍या-क्‍या हुआ और क्‍या-क्‍या हो रहा है, यह टीवी चैनलों के माध्‍यम से पूरे देश ने देखा. जाहिर है हाथरस का मामला उत्‍तरप्रदेश सरकार के लिये परेशानी का सबब बना.

हमने देखा है कि जब भी ऐसी घटनाएं होती हैं, चाहे वे कहीं पर भी किसी भी पार्टी की सरकार वाले राज्‍यों में होती हों, उन पर जाहिर की जाने वाली प्रतिक्रियाओं का अंदाज अलग अलग होता है. उस स्थिति में भी जबकि घटनाएं बिलकुल समान प्रकृति की होती है, राजनीतिक दलों का प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त करने का अंदाज अपने अपने दल की शासित सरकारों के संदर्भ में बदल जाता है. इसी तरह संबंधित सरकारें भी ऐसी प्रतिक्रियाओं को सहज रूप में लेने के बजाय उन्‍हें राजनीतिक एजेंडा बताने लगती हैं.

उत्‍तरप्रदेश में भी ठीक यही हुआ. हाथरस और बलरामपुर की घटनाओं पर राजनीतिक दलों का रवैया अलग-अलग नजर आया और इसी को लेकर सियासत भी हुई. कांग्रेस ने जब हाथरस की घटना को मुद्दा बनाया तो भाजपा की ओर से पूछा गया कि बलरामपुर मामले में ऐसी प्रतिक्रिया क्‍यों नहीं आई? कांग्रेस जवाब देती इससे पहले ही यह प्रश्‍न भी उठा दिया गया कि कहीं ऐसा इसलिये तो नहीं कि हाथरस और बलरामपुर में घटनाओं को अंजाम देने वाले आरोपी अलग अलग संप्रदायों के हैं. इसी तरह हाथरस की घटना को लेकर जातिवाद का मुद्दा भी गहराया. सरकार की ओर से बताया गया कि हाथरस कांड को लेकर इलाके में जातिवादी दंगा भड़काने की साजिश थी और इसके लिए बाकायदा विदेश से फंडिंग भी हुई. फंडिंग की यह राशि 100 करोड़ रुपये तक की बताई गई और उत्‍तरप्रदेश पुलिस ने इस सिलसिले में कुछ लोगों को पकड़ने का दावा भी किया.

सवाल यह है कि जब भी ऐसी घटनाएं होती हैं, उन पर प्रभावी कानूनी कार्रवाई के बजाय, उन्‍हें इस तरह राजनीतिक व सामाजिक विवादों में क्‍यों उलझा दिया जाता है? दरअसल ऐसा लगता है कि जब-जब भी इस तरह के मामलों में कोई प्रतिक्रिया आती है, उसका मोटा मकसद पीडि़तों को न्‍याय दिलाना नहीं बल्कि राजनीतिक स्‍कोर बराबर करना या फिर अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को घेरना होता है. प्रतिक्रियाओं को अपने राजनीतिक उद्देश्‍यों के लिए इस्‍तेमाल करना होता है. ऐसे मामलों में मीडिया भी बहुत गैर जिम्‍मेदाराना भूमिका अदा करता है. अकसर देखा गया है कि ऐसे गंभीर मामलों की रिपोर्टिंग भी अपराध और उसके होने की असली जड़ तक पहुंचने के बजाय राजनीतिक आरोप-प्रत्‍यारोप या प्रशासनिक लापरवाही को जिम्‍मेदार ठहराने पर केंद्रित हो जाती है. चूंकि इस काम में कोई मेहनत नहीं करना पड़ती इसलिए सबको यह तरीका बहुत रास आता है.

दुर्भाग्‍य से ऐसी किसी भी घटना पर राजनीतिक पार्टियों की तरह मीडिया भी आरोप-प्रत्‍यारोप वाली भाषा का इस्‍तेमाल करने लगता है. घटना क्‍यों हुई, कैसे हुई, उसके लिए कौन से कारण और कारक जिम्‍मेदार हैं, इसका पता लगाने के बजाय यह कहना ज्‍यादा आसान है कि अमुक सरकार फेल हुई, पुलिस और प्रशासन घोर लापरवाह है आदि. चूंकि सब को पता है कि मीडिया ऐसी घटनाओं पर कैसे रिएक्‍ट करेगा इसलिए सरकारें और प्रशासन भी अब बहुत चालाकी से उसे फांसते हैं.जब भी ऐसी घटनाएं होती हैं सरकारी दल की ओर से पहला काम मामले को राजनीतिक अखाड़े में खींचकर लाने का होता है और प्रशासन का पहला काम मीडिया से बनावटी लड़ाई में भिड़ जाने का. जैसे हाथरस में आपने देखा होगा. वहां व्‍यूह रचना ही इसी हिसाब से की गई कि मीडिया को फालतू बातों में उलझाया जा सके. घटना के केंद्र बूलगढ़ी गांव की घेराबंदी कर उसे पुलिस छावनी बना दिया गया. इसका नतीजा क्‍या हुआ? मीडिया घंटों पुलिस और प्रशासन के लोगों से गांव में घुसने के लिए भिड़ता रहा और उस भिड़ंत को ही महान कवरेज की तरह दिखाया जाता रहा.

मीडिया के कैमरे इस बात पर केंद्रित रहे कि कोई रिपोर्टर पुलिस या प्रशासनिक अधिकारी से इस सवाल के साथ कैसे उलझ रहा है या उलझ रही है कि- क्‍यों आप हमें अंदर क्‍यों नहीं जाने देंगे? ऐसा अंदर क्‍या हो रहा है जो आप छिपाना चाहते हैं? आपको हमें रोकने के लिए आदेश किसने दिए, उसका नाम बताइये? आपको बताना होगा कि आप किसको फोन लगा रहे हैं?… इधर मीडिया ऐसे ढेरों सवाल पूछता रहता है और उधर पुलिस व प्रशासन के अफसर बाहरी तौर पर मीडिया से उलझने का दिखावा करते हुए और अंदरूनी तौर पर, वास्‍तविकता में मीडिया को उलझाए रखने में कामयाब होते हुए, अपनी रणनीति पर खुश होते रहते हैं.

ऐसा सिर्फ मीडिया के साथ ही होता हो यह बात नहीं है. राजनीतिक दलों के साथ भी यही रणनीति अपनाई जाती है. राजनीतिक दल भी सबकुछ जानते बूझते, गाडि़यों के बड़े-बड़े काफिले और बड़ी संख्‍या में कार्यकर्ताओं की फौज लेकर घटनास्‍थल पर पहुंचने की जोर आजमाइश करते नजर आते हैं. हालांकि सबको पता होता है कि ऐसा होने नहीं दिया जाएगा. लेकिन शायद असली मकसद घटना की वास्‍तविक रिपोर्टिंग करना नहीं बल्कि इस जोर आजमाइश को प्रदर्शित करना होता है.

इस शक्ति प्रदर्शन के हो-हल्‍ले का परिणाम यह होता है कि सरकारों और प्रशासन को चीजें मनचाहे ढंग से सेट करने का समय और अवसर मिल जाता है. और इसी समय व अवसर का लाभ उठाते हुए घटना के पीछे कभी प्रेम प्रसंग की, कभी पुरानी रंजिश की, कभी प्रॉपर्टी विवाद की, कभी सांप्रदायिक मानसिकता की या फिर जातिवाद की थ्‍योरी फैला दी जाती है. एक दशक पहले तक आमतौर पर ऐसी घटनाओं में सांप्रदायिक या जातिगत एंगल बहुत कम देखा जाता था. ऐसा नहीं कि यह एंगल मौजूद ही नहीं था, यह एंगल तब भी रहता था लेकिन केंद्र में उसका आपराधिक पक्ष ही होता था, लेकिन पिछले कुछ समय से ऐसी हर घटना के पीछे सांप्रदायिक या जातिगत एंगल प्रमुखता से फिट किया जाता रहा है.

घटनाओं के सांप्रदायिक और जातिवादी एंगल ने अपराध और उसकी गंभीरता के साथ-साथ उस पर होने वाली कार्रवाई को भी बहुत हद तक प्रभावित किया है. उत्‍तरप्रदेश के ही विकास दुबे कांड में हमने देखा था कि वहां एक अपराधी की हरकतों और उसके बाद हुई कार्रवाई को किस तरह जातिवाद से काउंटर करने की कोशिश हुई थी. हाथरस में भी यही कोशिश हुई है. पुलिस और प्रशासन के लिए अपराधों से निपटने में यह बड़ी चुनौती है. अब उन्‍हें न सिर्फ अपराध और अपराधियों से निपटना होगा बल्कि यह भी ध्‍यान में रखना होगा कि पीडि़त और अपराधी किस संप्रदाय या जाति से हैं, उस इलाके में किस पक्ष की कितनी आबादी है… कौनसा पक्ष राजनीतिक तौर पर कितना हावी, प्रभावशील या लाभदायक है… आदि.
यदि राजनीतिक दल और व्‍यवस्‍था, वास्‍तव में ऐसी घटनाओं पर गंभीरता से कोई कार्रवाई चाहते हैं तो उन्‍हें अपना रवैया बदलना होगा. ऐसी हर घटना चाहे वह कहीं भी हो, विपक्ष की सरकार के राज में या अपनी सरकार के राज में, उस पर समान व्‍यवहार करना होगा. यह नहीं हो सकता कि विपक्षी दल के राज में हो तो फांसी की मांग हो जाए और अपने राज में हो तो अभयदान मिल जाए. अपराध अंतत: अपराध है, हम हाथरस, बलरामपुर, पालघर या करौली की घटनाओं में अलग-अलग स्‍टैंड नहीं ले सकते. खासतौर से राजनीतिक तौर पर तो कतई नहीं…
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

ब्लॉगर के बारे में

गिरीश उपाध्यायपत्रकार, लेखक

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. नई दुनिया के संपादक रह चुके हैं.

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