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सोनिया गांधी के खास थे मोतीलाल वोरा, अंतिम सांस तक निभाई वफादारी

(यूसुफ़ अंसारी)

कांग्रेस के दिग्गज नेता मोतीलाल वोरा (Motilal Vora) का सोमवार को निधन हो गया. दिल्ली के फोर्टिंस अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली. वे दो बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. 2000 से 2018 तक लगातार 18 साल पार्टी के कोषाध्यक्ष रहे. वोरा ने लंबे जीवन के साथ ही बड़ी ज़िंदगी भी पाई. आधी सदी कांग्रेस से जुड़े रहे. क़रीब बीस साल पत्रकार रहने के बाद 1970 में कांग्रेस से जुड़े तो ताउम्र कांग्रेसी ही रहे. इस बीच म्युनिसपिल कमेटी के सदस्य से लेकर विधायक, राज्य सरकार में मंत्री और फिर दो बार मुख्यमंत्री रहे. बाद में सांसद बने, केंद्र में मंत्री रहे और राज्यपाल भी. पार्टी संगठन में भी छोटे पदों से लेकर अध्यक्ष के बाद दूसरे नंबर के कोषाध्यक्ष पद पर रहे. लेकिन उनकी एक तमन्ना उनके साथ ही चली गई. वोरा छत्तीसगढ़ का मुख्य़मंत्री बनकर नारायण दत्त तिवारी की तरह दो राज्यों के मुख्यमंत्री होने का रिकॉर्ड बनाना चाहते थे. दुर्भाग्यवश उनकी ये हसरत उनके साथ ही चली गई. वोरा ने रविवार 20 दिसंबर को ही अपनी ज़िंदगी के 93 साल पूरे किए थे. वोरा के बाद अहमद पटेल को कोषाध्यक्ष बनाया गया था. क़रीब महीना भर पहले 25 नवंबर को पटेल का भी निधन हो गया.

ताउम्र कांग्रेसी रहे, निष्ठा पर नहीं उठे सवाल
पार्टी के प्रति उनकी निष्ठा पर कभी सवाल नहीं उठे. उन्हें पार्टी में जो भी ज़िम्मेदारी मिली, उसे पूरी लगन से निभाया. पार्टी के कोषाध्यक्ष रहते वो हमेशा पार्टी कार्यालय 24 अकबर रोड पर सुबह 10 बजे पहुंचते. दोपहर का खाना खाने घर जाते और फिर थोड़ा आराम करके वापस आ जाते. देर शाम तक बैठते. चेहरे पर बगैर शिकन लाए दिनभर पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ ही मीडियाकर्मियों और अन्य मुलाक़ातियों से मिलते. पार्टी में सभी उनकी सादगी और नरम लहजे के क़ायल थे. यही वजह है कि उनके निधन पर राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, “वोरा सच्चे कांग्रेसी और जबरदस्त इंसान थे. उनकी कमी बहुत खलेगी. उनके परिवार से साथ मेरी संवेदनाएं हैं.”पत्रकारों से थे मधुर रिश्ते

मोतीलाल वोरा शुरुआती जीवन में खुद पत्रकार रहे थे. लिहाज़ा दिल्ली में पत्रकारों के साथ उनके बेहद मधुर रिश्ते थे. पत्रकारों के लिए उनके कार्यालय और घर के दरवाज़े हमेशा खुले थे. 24 अकबर रोड पर कांग्रेस कोषाध्यक्ष के कार्यालय में पत्रकारों के आते ही वो सबसे पहले चाय या कॉफी के साथ कुछ खाने का ऑर्डर देते. पत्रकार उनके पास ख़बर की तलाश में जाते थे. ख़बर मिले न मिले चाय ज़रूर मिलती थी. कई बार वोरा चुटकी लेते हुए कहते थे, ‘आप जिस लिए मेरे पास आए हैं, उसमें मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकता, लेकिन मेरी मेहमान नवाज़ी में कोई कमी रह जाए तो माफ़ कीजिएगा.’

मतलब की बात सुनते और कहते थे
मोतीलाल वोरा को थोड़ा ऊंचा सुनाई देता था. कान में सुनने की मशीन लगाते थे. पत्रकारों की ज़्यादातर बातों का जवाब हां, हूं में ही देते. कई बार कान में लगी मशीन निकालकर रख देते थे. उस वक्त ये पता ही नहीं चलता था कि वो कौन सी बात सुन रहे हैं और कौन सी नहीं. पार्टी की किसी गतिविधि पर कोई राय नहीं देते थे. किसी नेता के बयान पर कोई टिप्पणी नहीं करते. न ऑन रिकॉर्ड न ही ऑफ़ रिकॉर्ड. शायद यही वजह रही कि वो हमेशा विवादों से दूर रहे. उनसे जब कभी किसी ख़बर की पुष्टि करनी चाही, उनका यही जवाब होता, ‘मुझे इस बारे में कुछ नहीं पता. मुझे तो यह आपसे ही पता चला है.’

जायसवाल के इस्तीफ़े की ख़बर हजम कर डकार भी नहीं ली

बात जून 2002 की है. श्रीप्रकाश जायसवाल प्रदेश अध्यक्ष थे और मोतीलाल वोरा उत्तर प्रदेश के प्रभारी थे. पार्टी में अंदरूनी कलह से तंग आकर श्रीप्रकाश जायसवाल ने प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. ये ख़बर आई तो कुछ पत्रकार इसकी पुष्टि के लिए वोरा के पास गए. उन्होंने ऐसे, ज़ाहिर किया कि जैसे उन्हें इस बारे में कोई ख़बर ही न हो. वो पत्रकारों से बोले, ‘मैं तो ये आप ही से सुन रहा हूं मुझे तो इस बारे में कुछ पता ही नहीं. उन्होंने हम सब पत्रकारों को सम्मान के साथ बिठाया. चाय पिलाई. मगर न तो ख़बर की पुष्टि की और न ही खंडन किया.

इसके बाद हमारे सामने ही जायसवाल को फोन लगवाया. उनका मोबाइल बंद था. उन्होंने अपने पीए को लगभग हड़काते हुए कहा कि जैसे ही उनसे संपर्क हो मेरी बात करवाना. चाय पीकर जैसे ही हम उनके कमरे से बाहर निकले उनके दरबान ने सारी पोल खोल दी. बोला जायसवाल साहब कल साहब से मिले थे. बंद लिफाफे में इस्तीफा देकर गए थे. लिफ़ाफ़ा उनकी मेज़ पर रखा है. साहब ने किसी को बताने से मना किया था. हमने दोबारा उनके कमरे में जाकर पूछा कि जायसवाल का इस्तीफा तो आपके मेज़ पर रखा है.

रंगे हाथों पकड़े जाने पर उन्होंने बहाना बनाया कि मैंने लिफ़ाफ़ा खोल कर नहीं देखा. इसलिए मुझे नहीं पता कि इसमें उन्होंने क्या लिखा है. मुझे पता होता तो आपको ज़रूर बताता. बाद में जायसवाल ने खुद इस बात की पुष्टि की थी कि उन्होंने वोरा को अपने हाथों से इस्तीफ़ा सौंपा था. उन्होंने उसे खोल कर पढ़ा भी था. बाद में वोरा ने एक बार इस मामले पर सफाई देते हुए कहा था कि मेरी वफादारी पार्टी के प्रति है. तब पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी नहीं चाहती थीं कि ये खबर बाहर आए. इसलिए मैंने किसी को कुछ नहीं बताया, लेकिन ख़बर तो आप लोगों तक पहुंच ही गई.

मायावती वोरा का करती थी बहुत सम्मान
बसपा प्रमुख मायावती, मोतीलाल वोरा का बहुत सम्मान करती थीं. जब कभी वोरा के सामने ये बात आती थी, वो पुरानी यादों में खो जाते थे. बताते थे कि मायावती को पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ उन्होंने ने ही दिलाई थी. उस वक़्त गेस्ट हाउस कांड की वजह से मायावती बहुत डरी हुई थीं. इतनी ज़्यादा कि मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बावजूद वो अपने घर जाने से डर रही थीं तब मोतीलाल वोरा ने राजभवन में उनके ठहरने का इंतजाम करवाया था. इस घटना का ज़िक्र उन्होंने कई बार किया. उन्हें इस बात का अफसोस ज़रूर रहा कि पार्टी ने मायावती के साथ उनके संबधों का कभी इस्तेमाल नहीं किया.

अविभाजित मध्यप्रदेश की राजनीति के सिरमौर थे
मोतीलाल वोरा ने समाजपार्टी से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की. 1968 में वे अविभाजित मध्यप्रदेश की दुर्ग म्युनिसिपल कमेटी के सदस्य बने. 1970 में उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा. 1972 में कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने. इसके बाद 1977 और 1980 में भी विधायक चुने गए. अर्जुन सिंह के मंत्रिमंडल में पहले उच्च शिक्षा विभाग में राज्य मंत्री रहे. 1983 में कैबिनेट मंत्री बनाए गए. 1981-84 के दौरान वे मध्यप्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम के चेयरमैन भी रहे. 13 फरवरी 1985 को वोरा को मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया. ठीक तीन साल बाद 13 फरवरी 1988 को मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देकर 14 फरवरी 1988 को केंद्र के स्वास्थ्य-परिवार कल्याण और नागरिक उड्डयन मंत्रालय का कार्यभार संभाला. अप्रैल 1988 में वोरा मध्य प्रदेश से राज्यसभा के लिए चुने गए. 26 मई 1993 से 3 मई 1996 तक उत्तर प्रदेश के राज्यपाल भी रहे.

नेशनल हेराल्ड मामले में विवादों में रहे
मोतीलाल वोरा 22 मार्च 2002 को एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL) के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक बनाए गए. नेशनल हेराल्ड न्यूजपेपर संपत्ति विवाद में वोरा का नाम भी रहा. फिलहाल इस केस को लेकर कोर्ट में अभी सुनवाई चल रही है. कोई फ़ैसला नहीं हुआ है. अहमद पटेल के बाद मोतीलाल वोरा का जाना कांग्रेस में पुरानी पीढ़ी की विदाई के संकेत हैं. आमतौर पर 90 साल की उम्र में नेता राजनीति में सक्रिय नहीं रह पाते, लेकिन मोतीलाल वोरा 2018 में कोषाध्यक्ष पद से हटने के बाद पार्टी में महासचिव के तौर पर सक्रिय थे और इसी भूमिका में उन्होंने इस दुनिया से विदा ली.


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