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वैक्सीन की वितरण व्यवस्था अभी से बनाने की दरकार | – News in Hindi

सुधीर जैन

अपने देश में कोल्ड चेन की मौजूदा व्यवस्था फाइजर की वैक्सीन को संभालकर रखने लायक नहीं है. इसके लिए शून्य से 75 डिग्री सेंटीग्रेड से भी नीचे की बर्फीली ठंडक का इंतजाम चाहिए.

Source: News18Hindi
Last updated on: November 21, 2020, 12:30 PM IST

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दवा कंपनी फाइज़र ने अपनी निर्माणाधीन वैक्सीन के कारगर होने का ऐलान कर दिया है. ऐसा दावा यह यकीन करने के लिए काफी माना जा रहा है कि अब कुछ महीनों के भीतर ही दुनिया को कोरोना की वैक्सीन यानी टीका मिल ही जाएगा. लेकिन इस दावे से अभी सिर्फ यह सवाल खत्म हुआ है कि टीका कब मिलेगात्र अब नया सवाल यह है कि इस वैक्सीन को सभी नागरिकों तक पहुंचाने की व्यवस्था कैसे बनेगी. कुछ देशों में तो टीका बनने से लेकर लगने तक उसे सुरक्षित रखने का काफी कुछ इंतजाम पहले से है लेकिन अपने देश में अभी यह व्यवस्था नहीं है. इस व्यवस्था को कोल्ड चेन कहा जाता है. अपने देश में कोल्ड चेन की मौजूदा व्यवस्था फाइजर की वैक्सीन को संभालकर रखने लायक नहीं है. इसके लिए शून्य से 75 डिग्री सेंटीग्रेड से भी नीचे की बर्फीली ठंडक का इंतजाम चाहिए.

अब तक की विशेषज्ञ चर्चाओं में निकलकर यही आया है कि फाइजर की वैक्सीन भारत के लिए उतनी व्यावहारिक नहीं है. हो सकता है इसीलिए दो तीन दिन से अपनी सरकार भी फाइजर की बजाए अपने देश में निर्माणाधीन वैक्सीन की चर्चा ज्यादा करवा रही है. उम्मीद बढ़ गई है कि आगे पीछे अपने देश में बन रही वैक्सीन भी सामने आ जाएगी. कुछ भी हो, वैक्सीन की बात इतनी आगे आ गई है कि अब वैक्सीन लगाने की व्यवस्था बनाने के काम पर लगने का वक्त आ गया है.

फाइजर और माॅर्डना के टीके का फर्क
फाइजर के अलावा एक और कंपनी मार्डना ने भी अपनी वैक्सीन के पर्याप्त कारगर होने का दावा ठोका है. दोनों में फर्क यह है कि फाइजर की वैक्सीन के लिए माइनस 75 डिग्री की कोल्ड स्टोरेज व्यवस्था चाहिए जबकि मार्डना का टीका सिर्फ माइनस 30 डिग्री में ही टिका रहेगा. यह बड़ा फर्क है. पूरा अंदेशा है कि जिन देशों की माली हालत उतनी अच्छी नहीं है वे फाइजर के टीके लायक व्यवस्था जल्द ही नहीं बना पाएंगे. जाहिर है उनके लिए माडर्ना का टीका ही विकल्प होगा. लेकिन अगर अपनी बात करें तो अभी हमारे पास माइनस तीस डिग्री की कोल्ड चेन व्यवस्था भी नहीं है. इसीलिए हम अपने देश में बन रहे टीके को ही अपने लिए मुफीद मान कर चल रहे हैं.

अभी क्या है हमारी मौजूदा स्थिति
विशेषज्ञों लेख आलेखों के मुताबिक अपने देश में अब तक माइनस 15 से 20 डिग्री ठंडक वाली व्यवस्था ही बन पाई है. और यह व्यवस्था भी इतनी सीमित आकार में है कि हम अभी एक समय में मुश्किल से दस लाख टीकों को ही संभालकर रख सकते हैं. यानी अपने सामने अब सबसे बड़ा मसला 130 करोड़ आबादी के लिए टीके की वितरण व्यवस्था बनाने का है. इसीलिए माडर्ना की वैक्सीन को भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के लिहाज से हाल फिलहाल अव्यवहारिक ही समझा जाना चाहिए. बहुत संभव है इसी कारण इस समय हमारे स्वास्थ्य प्रशासक अपने देश में बनाई जा रही वैक्सीन से ही ज्यादा उम्मीद लगा रहे हैं.

अपनी वैक्सीन की खासियतदेश में निर्माणाधीन वैक्सीन के बारे में अब तक की सूचना यह है कि वह दो से लेकर आठ डिग्री के तापमान पर भी टिकी रहेगी. अगर ऐसी वैक्सीन जल्द बनकर तैयार हो जाती है तो इससे बढ़िया बात हो ही नहीं सकती. ये अलग बात है अपनी वैक्सीन के तीसरे चरण का टायल अभी शुरू ही हो रहा है. यह कितने फीसद कारगर निकलेगी? और यह कितनी सुरक्षित साबित होगी इसकी जानकारी तीसरे चरण के प्रयोगों के बाद ही मिलेगी. इसी तरह ऑक्सफोर्ड के सहयोग से बन रही तीसरी वैक्सीन भी अग्रिम मोर्चे पर है. यानी जिस तरह से दुनियाभर में निर्माणाधीन कई टीकों के कारगर हाने का पता चल रहा है उस हिसाब से हमें भी अपनी वैक्सीन के कारगर साबित हो जाने की उम्मीद करनी चाहिए. बस फर्क पड़ेगा तो वह समय का होगा. फिर भी देर सबेर हम अपनी वैक्सीन विकसित कर लेने की उम्मीद तो लगा ही सकते हैं.

वैक्सीन के वितरण की व्यवस्था भारी भरकम काम होगा
वैक्सीन बनने का काम कब तक पूरा होगा इसका मोटा अनुमान तो लग गया है लेकिन अब समस्या है उसके वितरण की. वितरण यानी दुनिया के सभी नागरिकों को यह टीका लगाने का काम अभूतपूर्व प्रकार का है. हमारे लिए तो बहुत बड़ा है. क्योंकि हमारी आबादी आज दिन तक 135 करोड़ से भी ज्यादा है. दवा कारखाने से निकलने के बाद उसे इस्तेमाल किए जाने तक टीके को सुरक्षित रखना भारीभरकम काम है. बेशक देश के पास पोलियो के टीके का हाल का अनुभव है. लेकिन वह भी आकार में कोरोना के टीके से बहुत छोटा काम था. इसमें विश्व स्वास्थ्य संस्था डब्ल्यूएचओ का बड़ा योगदान भी था. इस समय डब्ल्यूएचओ की माली हालत अच्छी नहीं है. यानी कोरोना टीके के वितरण व्यवस्था के आकार प्रकार का हिसाब हमें अभी से बैठाना शुरू कर देना चाहिए.

क्या अकेले सरकार की बस की बात होगी
कुछ साल पहले आयुष्मान भारत नामकी स्वास्थ्य बीमा योजना बनाते समय हम काफी कुछ हिसाब लगा चुके हैं. पचास करोड़ गरीब लोगों को पांच लाख रुपये के बीमे की स्वास्थ्य सुविधा पहुंचाने की बात सोची जा चुकी है. लेकिन कोरोना टीके को सभी तक पहुंचाने का काम आबादी के लिहाज से उससे बहुत बड़ा है. इतना बड़ा कि अगर एक व्यक्ति को टीके की दो डोज देने की कीमत ही एक हजार रुपये बताई जा रही है. सरकार खुद माने या न माने लेकिन व्यावहारिकता के लिहाज़ से नागरिकों को तो यह मानकर चलना ही चाहिए कि सरकारी खजाने की मौजूदा हालत को देखते हुए यह काम अकेले सरकार का बस का है नहीं. सामाजिक क्षेत्र और उ़़द्योग जगत के सामाजिक उत्तरदायित्व को याद करने का समय आ गया है.

धन के अलावा समय का हिसाब लगाना भी जरूरी
केरोना संक्रामक रोग है. इस जड़ से खत्म करने का ही लक्ष्य होना चाहिए. एक निश्चित समय में ज्यादा से लोगों को कोरोना प्रतिरोधी बनाने के लिए समयबद्ध अभियान की दरकार होगी. यह काम सीमित सरकारी संसाधनों से नहीं निपटाया जा सकता. हमें अभी से सामाजिक कार्यकर्ताओं की फौज तैयार करने के काम पर लग जाना चाहिए. देश के कोने कोने में जहां भी वैक्सीन को सुरक्षित रखने की व्यवस्था बन सकती हो उनकी पहचान का काम अभी से करने की दरकार है. ऐन मौके पर अगर यह काम शुरू करना पड़ा तो व्यवस्था बनाने में छह आठ महीने यूं ही लग जाएंगे. तब तक तो हालात हाथ से ही निकल जाएंगे.वैक्सीन आने की उम्मीद बंध जाने के बाद अब हमें फौरन ही वितरण व्यवस्था बनाने के काम पर लग जाना चाहिए.


ब्लॉगर के बारे में

सुधीर जैन

अपराधशास्त्र और न्यायालिक विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की. सागर विश्वविद्यालय में पढाया भी. उत्तर भारत के 9 प्रदेश की जेलों में सजायाफ्ता कैदियों पर विशेष शोध किया. मन पत्रकारिता में रम गया तो 27 साल ‘जनसत्ता’ के संपादकीय विभाग में काम किया. समाज की मूल जरूरतों को समझने के लिए सीएसई की नेशनल फैलोशिप पर चंदेलकालीन तालाबों के जलविज्ञान का शोध अध्ययन भी किया.देश की पहली हिन्दी वीडियो ‘कालचक्र’ मैगज़ीन के संस्थापक निदेशक, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस और सीबीआई एकेडमी के अतिथि व्याख्याता, विभिन्न विषयों पर टीवी पैनल डिबेट. विज्ञान का इतिहास, वैज्ञानिक शोधपद्धति, अकादमिक पत्रकारिता और चुनाव यांत्रिकी में विशेष रुचि.

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First published: November 21, 2020, 12:30 PM IST


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