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भाड़े पर आदिवासियों को लाकर 1904 ओलंपिक में किया गया था शामिल, पार हुई थीं नस्लभेद की सारी सीमाएं | nation – News in Hindi

नॉर्थ-ईस्ट में बारिश के लिए किये गये एक आयोजन के दौरान जनजातीय लोग (सांकेतिक फोटो, क्रेडिट- AP Photos)

19वीं शताब्दी और 20वीं शताब्दी के शुरुआती सालों में पश्चिमी देशों (Western Countries) में दुनियाभर के अलग-अलग नस्लों और जनजातीय समूह के लोगों (people of different races and tribal groups) की प्रदर्शनी लगाई जाती थी. इन्हें सर्कस (circus), रोड शो और बड़ी-बड़ी प्रदर्शनियों के दौरान भी दिखाया जाता था. प्रदर्शनी (exhibition) के दौरान इन्हें वैसे ही आम लोगों से दूर रखा जाता था, जैसे जंगली जानकारों को चिड़ियाघरों (Zoo) में रखते हैं. प्रदर्शनी के लिए जिन जनजातीय लोगों को लाया जाता था, वे ज्यादातर अफ्रीका (Africa), दक्षिणपूर्वी एशिया (South-East Asia), पश्चिम एशिया, प्रशांत महासागर के द्वीपों और दक्षिणी अमेरिका (South America) से ले जाये जाते थे. प्रदर्शनी के दौरान इनके नकली घर बनाए जाते थे और इन्हें ‘आदिवासियों’ (Primitive) और ‘बौने लोगों’ के तौर पर पेश किया जाता था.

साल 1904 में ऐसी ही एक प्रदर्शनी का आयोजन सेंट लुईस, मिसौरी में ओलंपिक खेलों (Olympics) के दौरान भी हुआ, जिसमें इन जनजातीय लोगों (Tribal People) ने ‘विशेष ओलंपिक प्रतिस्पर्धाओं’ में भाग लिया. इन्हें दूसरे प्रदर्शनों से लाया गया था. आयोजन को नाम दिया गया ‘मानवविज्ञान के दिन’ या एंथ्रोपोलॉजी डेज़ (Anthropology Days). हालांकि यह पूरी तरह से जनजातियों के पिछड़े होने का दावा करने और गोरे लोगों (White people) के उन पर श्रेष्ठता प्रदर्शित करने का प्रयास था. इस विचार के पीछे थे जेम्स सुलीवन, जो 1904 ओलंपिक (1904 Olympics) के मुख्य आयोजक थे.

पूरी तरह से फ्लॉप शो साबित हुआ ‘एंथ्रोपोलॉजी डेज़’
इन खेलों के दौरान अलग-अलग प्रतिस्पर्धाओं में करीब 100 से ज्यादा जनजातीय लोगों ने भाग लिया. इन प्रतिस्पर्धाओं में बेसबॉल थ्रो, शॉटपुट, दौड़, लंबी कूद, भारोत्तोलन, मलखंब और रस्सी खींच शामिल थे. इसमें कोई बड़ा आश्चर्य नहीं होना चाहिये कि भाड़े पर बुलाए गये जनजातीय खिलाड़ियों ने बिना तैयारी और बिना नियमों की जानकारी के खेलों में बेहद खराब प्रदर्शन किया.शॉटपुट प्रतिस्पर्धा में 6 लोगों ने भाग लिया लेकिन जब उनसे दूसरा राउंड खेलने को कहा गया तो वे मुकर गये. वहीं दौड़ में ज्यादातर खिलाड़ी अंत की पट्टी तक पहुंचकर रुक गये और अन्य खिलाड़ियों के आ जाने के बाद पट्टी के नीचे से निकल गये. रस्सी खींच प्रतियोगिता के दौरान कुछ लोग बहुत अच्छे कपड़े पहनकर आ गये और जब उन्हें पता चला कि मिट्टी में रस्सी को खींचा जाना है तो उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया. यहां तक कि भाला फेंक प्रतियोगिता भी पूरी तरह से फेल साबित हुई. जिसके बारे में आयोजकों का मानना था कि भाला लेकर चलने वाले जनजातीय इसमें बहुत रुचि लेंगे. आयोजक ये देख हैरत में थे कि कई लोगों को तो भाला पकड़ना ही नहीं आ रहा था. अंतत: ‘एंथ्रोपोलॉजी डेज़’ बुरी तरह पिटा. न दर्शक आये न खिलाड़ी. स्थानीय लोगों ने भी इसे फ्लॉप शो बताया.

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सबसे चौंकाने वाला था ‘आधुनिक ओलंपिक के जनक’ का रिएक्शन
फिर भी सुलीवन ने भाला फेंक प्रतियोगिता में जनजातीय लोगों के ओलंपिक रिकॉर्ड न तोड़ पाने को गोरे लोगों की जातीय श्रेष्ठता के तौर पर पेश किया. लेकिन सबसे चौंकाने वाला रिएक्शन था, ‘आधुनिक ओलंपिक के पिता’ कहे जाने वाले बैरों पियरे डी कुबर्तिन का. इन्होंने किसी महानगर में होने के बजाए सेंट लुईस जैसे द्वितीय श्रेणी के शहर में ओलंपिक आयोजित होने के चलते एक तरह से उसका बायकॉट किया था लेकिन इस आयोजन के बाद वे डरे हुए थे. एक रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने अपने बयान में कहा था, “जब काले लोग, लाल लोग और पीले लोग दौड़ना, कूदना और फेंकन सीख जायेंगे और गोरे लोगों को पीछे छोड़ देंगे, तब (ओलंपिक) अपना आकर्षण खो देगा.”


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