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नेपाल का सियासी संकट क्या है और भारत के लिए इसके क्या मायने हैं?

नेपाल में संसद भंग क्यों हुई और मध्यावधि चुनाव की नौबत क्यों आई? नेपाल में अचानक राजनीतिक संकट (Political Crisis of Nepal) के हालात बन गए या फिर इसकी कोई कहानी है कि चुनी हुई सरकार अपना कार्यकाल पूरा क्यों नहीं कर पाई! इन सब बातों के बीच जानने की बात यह भी है कि नेपाल के इस संकट से भारत का क्या लेना-देना है. इन तमाम बातों से पहले जानि लीजिए कि नेपाल की राष्ट्रपति (Nepal President) बिद्या देवी भंडारी (Bidya Devi Bhandari) ने संसद भंग कर चुनाव का ऐलान कर दिया है. नेपाल में मध्यावधि चुनाव की तारीखों की घोषणा भी कर दी गई है. 30 अप्रैल और 10 मई 2021 को चुनाव के बाद नेपाल में नई सरकार बनेगी.

इससे पहले प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली (KP Sharma Oli) की कैबिनेट ने सत्ता पर काबिज़ कम्युनिस्ट पार्टी में मतभेदों के बाद संसद भंग करने की सिफारिश की थी. इस पूरे सियासी संकट के केंद्र में कैसे नेताओं के अहम का टकराव सामने आया, कैसे तानाशाही प्रवृत्ति का खुलासा हुआ और कैसे एक कानून को लेकर छिड़ी बहस का अंजाम यह हुआ कि संसद भंग होने तक की नौबत आई और यह भी जानने की बात है कि यह कदम नेपाल के संविधान के अनुकूल है या नहीं.

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अहम के टकराव से गहराए विवादनेपाल में सत्तारूढ़ पार्टी सीपीएन (माओवादी) में सह अध्यक्ष पुष्प कमल दहल (प्रचंड), माधव कुमार नेपाल और झाला नाथ खनाल जैसे वरिष्ठ नेता पीएम ओली पर न केवल सरकार बल्कि पार्टी को भी अपने मन मुताबिक चलाने के आरोप लगाते रहे थे. वास्तव में ओली और प्रचंड की पार्टियों ने सरकार बनाने के लिए गठबंधन किया था और दोस्ती की मिसाल यह थी कि सरकार बनते ही दोनों पार्टियों का विलय हो गया था. लेकिन यह दोस्ती ज़्यादा वक्त नहीं चली.

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पीएम ओली की सिफारिश के बाद नेपाल की संसद भंग कर दी गई.

जानकारों की मानें तो ओली एक तानाशाह की तरह सरकार और पार्टी से जुड़े फैसले ले रहे थे. इसी का उदाहरण यह था कि ओली ने उस अध्यादेश को कानून बनाने के लिए पार्टी से जबरन समर्थन चाहा था, जिसके तहत प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष की सहमति के बगैर ही संवैधिानिक पदों पर नियुक्ति करना संभव हो सकता था. इस तरह के कानून के प्रस्ताव पर प्रचंड और ओली के बीच मतभेद उभरकर सामने आए.

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प्रचंड ने इस तरह के प्रस्ताव और फैसले को पीएम ओली की निरंकुशता तक कहा और इसे लोकतंत्र का मज़ाक उडत्राने वाला करार दिया. आंतरिक कलह बढ़ती चली गई और ओली ने अपने दबदबे को बरकरार रखने के लिए वो कदम उठाया, जो देखने में तो मास्टर स्ट्रोक है, लेकिन जिसे संविधान के खिलाफ भी कहा जा रहा है.

नेपाल के संविधान में नहीं है प्रावधान!
संविधान विशेषज्ञ बिपिन अधिकारी के हवाले से खबरों में कहा गया कि ओली ने असंवैधानिक सिफारिश की. साल 2015 के नेपाल संविधान में पीएम के पास ऐसा कोई खास अधिकार नहीं है कि वो प्रतिनिधि सभा को भंग करने की सिफारिश कर सके. बीबीसी की एक रिपोर्ट की मानें तो ओली कैबिनेट के फैसले को कोर्ट में चुनौती दी जाएगी. जानकारों के मुताबिक नेपाल के संविधान के अनुच्छेद 85 में प्रतिनिधि सभा के कार्यकाल को लेकर उल्लेख है, लेकिन स्पष्ट नहीं है.

नेपाल का झंडा (Symbolic Image)

दूसरी तरफ, संविधान के अनुच्छेद 76 के अनुसार पपीएम अगर विश्वास मत हासिल नहीं कर पाते हैं तो राष्ट्रपति को प्रतिनिधि सभा भंग करने का अधिकार ज़रूर है, लेकिन इस मामले में पीएम को किसी तरह की सिफारिश करने का कोई अधिकार नहीं है. ओली के नेतृत्व वाली नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी ने भी कैबिनेट के इस फैसले का विरोध किया. पार्टी के प्रवक्ता नारायणजी श्रेष्ठ ने कहा कि यह फैसला लोकतांत्रिक मानदंडों के खिलाफ है और राष्ट्र को पीछे ले जाएगा.

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भारत और चीन की कवायदों के बीच घटनाक्रम!
नवंबर महीने के आखिरी हफ्ते में भारत के विदेश मंत्रालय के सचिव और राॅ के अफसरों ने लगातार नेपाल के दौरे किए थे. नेपाल के साथ रिश्ते सुधारने की कवायद के तहत भारत ने ये कदम उठाए थे औश्र इनका सकारात्मक असर दिखा भी था जब अपने नए नक्शे को लेकर सीमा विवाद में उलझे नेपाल ने द्विपक्षीय वार्ता का समर्थन किया था. उस समय भी नेपाल की सत्तारूढ़ पार्टी में आंतरिक कलह की तरफ भारत ने संकेत किया था और नेपाल ने कहा था कि यह उसका आंतरिक मामला है.

दूसरी तरफ, चीन के रक्षा मंत्री वे फंगख की नेपाल यात्रा भी उसी समय हुई थी, जिसे लेकर काफी हंगामा भी हुआ था. भारतीय राजनयिकों के नेपाल दौरे से लौटनके बाद फंगख की यात्रा उस समय हो रही थी, जब नेपाल पीएम ओली की पार्टी में आंतरिक मतभेद और कलह काफी चर्चा में थी. जानकारों ने पहले भी अंदेशा जताया था कि चीन के इशारे पर नेपाल भारत विरोधी कदम उठा रहा था और चीन के ही दम पर नेपाल सरकार बड़े फैसले ले सकती है.

क्या हो सकता है भविष्य?
नेपाल की इस आंतरिक कलह वाली सियासत के वलते पीएम ओली की निरंकुश छवि से नेपाल की स्थिति दुनिया भर में कमज़ोर पड़ सकती है. सरकार के इस कदम को लेकर विरोध प्रदर्शन सड़कों पर शुरू हो चुके हैं और आगामी समय में यह गतिरोध और रफ्तार पकड़ सकता है. जानकार यह भी कह रहे हैं कि विपक्ष में रही नेपाली कांग्रेस पार्टी के लिए यह अच्छा मौका साबित हो सकता है और ओली सत्ता में रहेंगे या नहीं, इस बारे में सुप्रीम कोर्ट भी बड़ा रोल निभा सकता है.

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कहा जा रहा है कि नेपाल के संविधान की व्याख्या करने का काम सुप्रीम कोर्ट करेगा. शीर्ष कोर्ट के रुख के बाद यह तय होगा कि ओली सरकार के फैसले कितने जायज़ रहे. अगर कोर्ट से ओली को झटका लगा तो नेपाल में उनके समीकरण बिगड़ सकते हैं. वहीं, भारत के खिलाफ ओली ने जिस तरह नकारात्मक रवैया अपनाया, भारत इस पूरी स्थिति पर नज़र रखने के साथ ही समय पर हस्तक्षेप से चूकेगा भी नहीं.


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