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टीपू सुल्तान को क्यों कहा जाता है देश का पहला मिसाइल मैन

भारत में 16वीं सदी के मैसूर के शासक टीपू सुल्तान की छवि को लेकर दो अलग-अलग मत है. एक उन्हें वीर योद्धा और महान शासक मानते हैं और दूसरे सांप्रदायिक नज़र से देखते हैं. लेकिन उनकी एक छवि पर किसी को कोई शक नहीं है. वो है मिसाइल मैन की छवि. ये भी कहा जाता है कि देश की किसी सेना में उन्होंने पहली बार बारूदी रॉकेट्स का इस्तेमाल किया था. जो काफी हिट रहा था.

टीपू सुल्तान ने अपने शासन में एक ऐसा प्रयोग किया, जो उन्हें इतिहास में मजबूत स्थान देता है. टीपू सुल्तान ने युद्ध के दौरान छोटे-छोटे रॉकेट का इस्तेमाल किया था. दुनिया में वो अपनी तरह का पहला प्रयोग था इसलिए उन्होंने दुनिया का पहला मिसाइल मैन भी कहा जाता है.

सेना में रॉकेट तकनीक का जमकर इस्तेमाल 
दक्षिण में राज्य विस्तार के दौर में टीपू सुल्तान और उनके पिता ने युद्ध में रॉकेट तकनीक का जमकर इस्तेमाल किया. दुश्मन की सेना को नुकसान पहुंचाने में तो रॉकेट ज्यादा कारगर नहीं थे लेकिन खलबली जरूर मचा देते थे.

टीपू सुल्तान की सेना के रॉकेट उन दिनों के हिसाब से खासे मारक और खतरनाक थे. वो 02 किलोमीटर की दूरी तक मार करने में सक्षम थे.

उस दौर में टीपू की सेना जिन रॉकेट का इस्तेमाल करती थी. वो छोटे और गजब मारक होते थे. इन रॉकेटों को लॉन्च करने के लिए लोहे की नली का इस्तेमाल किया जाता था.

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ये रॉकेट 2 किलोमीटर तक मार करने में सक्षम हुआ करते थे. इतिहासकारों के मुताबिक पोल्लिलोर की लड़ाई में इन्हीं रॉकेटों के इस्तेमाल ने पूरा खेल ही बदलकर रख दिया. इससे टीपू की सेना को खासा फायदा हुआ.

हैरान रह गए थे अंग्रेज
अंग्रेजों के खिलाफ पोल्लिलोर की लड़ाई में जब उन्होंने रॉकेट का इस्तेमाल किया तो वो हैरान रह गए. इसी रॉकेट की तकनीक का इस्तेमाल उन्होंने सम्राट नेपोलियन के खिलाफ किया था. इतिहासकारों के मुताबिक ये प्रयोग उन्हें ज्यादा फायदा नहीं दिला सका. क्योंकि वो किलेबंदी को नहीं भेद सके थे.

अंग्रेज इन रॉकेट को अपने साथ ले गए
भारत के पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइल कार्यक्रम के जनक एपीजे अब्दुल कलाम ने अपनी किताब ‘विंग्स ऑफ़ फ़ायर’ में लिखा था कि मैंने लंदन के साइंस म्यूजियम में टीपू सुल्तान के कुछ रॉकेट देखे. ये उन रॉकेट में से थे जिन्हें अंग्रेज अपने साथ ले गए थे.

ये दिवाली वाले रॉकेट से थोड़े ही लंबे होते थे. टीपू के ये रॉकेट इस मायने में क्रांतिकारी कहे जा सकते हैं कि इन्होंने भविष्य में रॉकेट बनाने की नींव रखी.

जब टीपू सुल्तान की सेना ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध में बारूदी रॉकेट का इस्तेमाल किया तो वो हैरान रह गए. इससे अंग्रेज सेना को बहुत नुकसान हुआ. वो सोच भी नहीं सकते थे कि किसी भारतीय राजा की सेना के पास ये तकनीक भी होगी.

नासा के सेंटर में टीपू के रॉकेट की पेंटिंग
अब्दुल कलाम ने किताब में आगे लिखा कि नासा के एक सेंटर में टीपू की सेना की रॉकेट वाली पेंटिग देखी थी. कलाम लिखते हैं, “मुझे ये लगा कि धरती के दूसरे सिरे पर युद्ध में सबसे पहले इस्तेमाल हुए रॉकेट और उनका इस्तेमाल करने वाले सुल्तान की दूरदृष्टि का जश्न मनाया जा रहा था. वहीं हमारे देश में लोग ये बात या तो जानते नहीं या उसको तवज्जो नहीं देते.”

टीपू सुल्तान का जन्म 20 नवम्बर 1750 को कर्नाटक के देवनाहल्ली (यूसुफ़ाबाद) हुआ था. उनका पूरा नाम सुल्तान फतेह अली खान शाहाब था. उनके पिता का नाम हैदर अली और माता का नाम फ़क़रुन्निसा था. 4 मई 1799 को 48 वर्ष की आयु में कर्नाटक के श्रीरंगपट्टनममें टीपू अपनी आखिरी साँस तक अंग्रेजों से लड़ते लड़ते शहीद हो गए.


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