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क्यों मौसम विभाग एकाएक लद्दाख में बढ़ा रहा है अपना रडार नेटवर्क?

देश का ये कदम चीन की उस बात का जवाब माना जा रहा है, जिससे वो लद्दाख तक में मौसम पर नियंत्रण की कोशिश कर रहा है. बता दें कि लद्दाख में एलएसी (Line of Actual Control) पर दोनों देशों के बीच कई महीनों से तनाव बना हुआ है और सैनिकों के अलावा तकनीक की मदद से भी दोनों ही ऊपर रहने की कोशिश कर रहे हैं.

क्या बदलाव होने जा रहा है
लद्दाख में सर्दियों के दौरान तापमान -40 डिग्री सेल्सियस तक भी चला जाता है. ऐसे में सैनिक किसी भी चुनौती का सामना कर सकें, इसके लिए मौसम का अनुमान होना काफी जरूरी है ताकि वे उसी हिसाब से तैयारी कर सकें. यही कारण है कि IMD लद्दाख में 10 रडार लगाने की बात कर रहा है. ये मौसम में बदलाव पर नजर रखेंगे.

ये भी पढ़ें: जानिए, America किन देशों को मानता है आतंकवाद का गॉडफादरयूरेशियन टाइम्स की रिपोर्ट में ये बात मिनिस्ट्री ऑफ अर्थ साइंस के सेक्रेटरी एम राजीवन के हवाले से कही गई. उन्होंने बताया कि तीन रडार हिमालय में लगाए जा चुके हैं और जल्दी ही बाकी रडार लगाने का काम भी हो जाएगा. हालांकि सारे रडार कब तक लगाए जा सकेंगे, इसपर कोई पक्की जानकारी नहीं दी गई.

लद्दाख में सर्दियों के दौरान तापमान -40 डिग्री सेल्सियस तक भी चला जाता है- सांकेतिक फोटो (news18 English)

क्यों जरूरी है रडार नेटवर्क बढ़ाना
हिमालय में बदलते मौसम पर नजर रखने की एक वजह तो चीन है लेकिन एक और कारण भी है. देश के इस हिस्से के मौसम का पूरे देश पर ही असर होता है. यही कारण है कि यहां के मौसम का पूर्वानुमान हो सके तो देश भर में इस लिहाज से तैयारी हो सकती है. इसके अलावा भी पहाड़ी इलाकों के मौसम पर नजर रखना जरूरी है. हिमालय की ऊंची श्रृंखलाओं को थर्ड पोल कहा जाता है. ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण यहां बर्फ तेजी से पिघल रही है. ये आगे चलकर आबादी के लिए खतरा हो सकती है. इसलिए भी देश के इस हिस्से के मौसम को मॉनिटर करना जरूरी माना जा रहा है. यही वजह है कि वहां रडार लगाए जा रहे हैं.

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कैसे काम करेगा सिस्टम 
यहां ये भी समझ लेते हैं कि आखिर रडार कैसे काम करता है. रडार असल में एक प्रणाली है, जो सूक्ष्मतंरगों के जरिए किसी घटना या वस्तु का पता लगाती है. जैसे इसकी मदद से युद्ध में या शांतिकाल में भी जासूस विमानों, पनडुब्बी का पता लगाया जा सकता है. इसके अलावा मौसम में तेजी से आ बदलाव को भी इससे जांचा जा सकता है.

हिमालय में बदलते मौसम पर नजर रखने की एक वजह तो चीन है सांकेतिक फोटो (pixabay)

चीन के जवाब में कार्रवाई 
वैसे नए रडार का ये कदम चीन के वेदर मॉडिफिकेशन सिस्टम लॉन्च करने के एलान के तुरंत बाद आया है. इससे ये अंदाजा लगाना भी मुश्किल नहीं कि देश तकनीक के स्तर पर भी चीन से मुकाबला करने की तैयारी में है. बता दें कि इस तकनीक के जरिए चीन बर्फबारी और बारिश जैसे मौसमी बदलावों पर काबू कर सकेगा. खबर है कि इस तकनीक को बनाने की वो लंबे समय से कोशिश कर रहा था और केवल साल 2012 से 2017 के बीच इस पर करीब 9889 करोड़ रुपये लगाए गए हैं.

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प्रोग्राम प्रायोगिक स्तर से आगे आ चुका है और चीन को इसमें सफलता भी मिलने लगी है. विशेषज्ञों को डर है कि खुराफाती चीन इसका इस्तेमाल भी हथियार की तरह करने से बाज नहीं आएगा. यूरेशियन टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक लद्दाख में ठंड में जिस तरह की हड्डियां जमाने वाली ठंड पड़ती है, भारतीय इलाके में वो उसे और बढ़ाकर सैनिकों की मुश्किल को और ज्यादा बढ़ा सकता है.

सांकेतिक फोटो

ये भी हो सकता है कि वो पहले से ही -40 डिग्री सेल्सियस में रह रहे भारतीय सैनिकों के क्षेत्र में मौसम और भी कठिन बना दे. ऐसे में पूरी तैयारी के बाद भी सैनिकों का मनोबल प्रभावित हो सकता है. बता दें कि लद्दाख में विषम हालातों में किसी का भी टिकना आसान नहीं है. ऐसे में सैनिकों को लंबे समय तक वहां बने रहने के लिए खास तैयारी करनी होती है, जिसमें कपड़ों से लेकर तंबू और कई तरह के उपकरण शामिल हैं. इसके बाद भी ठंड में जान जाने का खतरा हरदम बना रहता है. इन हालातों में चीन का मौसम में भी बदलाव कर पाना एक और मुसीबत बन सकता है.

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भारत-चीन तनाव के बीच हो सकता है कि चीन मौसम बदलने की इस तकनीक का उल्टा- पुल्टा इस्तेमाल करने लगे. मणिपाल अकादमी की असिस्टेंट प्रोफेसर धनश्री जयराम के मुताबिक बिना रेगुलेशन के जियोइंजीनियरिंग करना दो देशों जैसे भारत और चीन के बीच तनाव बढ़ा सकता है. चूंकि इसका प्रभाव काफी दूर तक होता है तो ये हो सकता है कि चीन अपने इलाके में बदलाव की कोशिश करे तो इसका असर हमारे यहां भी हो और मौसम ज्यादा विपरीत हो जाए.

मिसाल के तौर पर अगर चीन अपने यहां घनघोर बारिश रोकने के लिए मौसम से छेड़छाड़ कर उसे कम करने की कोशिश करे और इसका असर भारत के उन इलाकों तक चला जाए, जहां पहले से ही कम बारिश होती है तो यहां सूखा पड़ सकता है. इस तरह से दोनों देशों में तनाव बढ़ सकता है.


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