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क्या है हलाल वैक्सीन, मुस्लिम समुदाय जिसकी मांग कर रहा है

दुनियाभर में कोरोना वैक्सीन को पहले पाने को लेकर होड़ शुरू हो गई है. इस बीच ब्रिटेन और दक्षिण अफ्रीका में वायरस का नया रूप भी सामने आया, जो ज्यादा संक्रामक माना जा रहा है. वहीं दुनियाभर के इस्लामिक धर्मगुरु इस बात पर बहस कर रहे हैं कि कोरोना वैक्सीन के मौजूदा स्वरूप को अपनाना इस्लाम में जायज होगा या नहीं. असल में वैक्सीन बनाने में पोर्क इस्तेमाल हुआ है, जिसके कारण इस्लामिक समुदाय में इसे लेकर असमंजस बन गया है.

टीकाकरण ठीक तरह से शुरू होने से पहले ही उसके बाधित होने के कई कारण बन गए हैं. इन्हीं में से एक है कोरोना वैक्सीन में पोर्क जिलेटिन का इस्तेमाल होना. इसे लेकर विवाद हो रहा है कि क्या इसे इस्लाम पर यकीन करने वाले भी ले सकते हैं. इसकी वजह ये है कि टीकों के भंडारण और दूसरी प्रक्रिया के दौरान उसे सेफ रखने के लिए सुअर के मांस से बने जिलेटिन का उपयोग. ये जिलेटिन कोरोना के वैक्सीन ही नहीं, बल्कि लगभग सारे ही टीकों को सेफ रखने में इस्तेमाल होता आया है.

टीके को सेफ रखने के लिए सुअर के मांस से बने जिलेटिन का उपयोग होता है – सांकेतिक फोटो (pixabay)

सुअर के मांस से बने इस जिलेटिन को स्टेबलाइजर कहते हैं. इसका होना वैक्सीन की क्वालिटी बनाए रखने को सुनिश्चित करता है. वैसे तो फाइजर, मॉडर्न, और एस्ट्राजेनेका के अधिकारी दावा कर रहे हैं कि उनकी वैक्सीन जिलेटिन-फ्री है लेकिन कई कंपनियों ने ये साफ नहीं किया है कि क्या वे भी बगैर पोर्क जिलेटिन के टीके भिजवा रही हैं. चूंकि देश की सरकारें टीका लेते हुए उसके जिलेटिन-फ्री होने की बात सुनिश्चित करें, ऐसा नहीं होगा इसलिए कई मुस्लिम बहुल देशों में इस बात को लेकर चिंता होने लगी है.ये भी पढ़ें: करगिल युद्ध के दौरान PM वाजपेयी ने कई बार की शरीफ से बात, किताब में सनसनीखेज दावा

ये चिंता मुस्लिम समुदाय के अलावा यहूदियों में भी दिख रही है. बता दें कि यहूदियों में भी सुअर के मांस का इस्तेमाल वर्जित है. और इसे लेने को अशुद्ध होने की तरह देखा जाता है. ऐसे में बेहद पारंपरिक तौर-तरीके से रहने वाले यहूदी समुदाय में भी इसे लेकर समस्या हो सकती है. इसके साथ ही वैक्सीन के हलाल सर्टिफिकेशन की मांग उठ रही है.

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हलाल एक अरेबिक शब्द है जिसका मतलब है जायज़ या वैध. ये इस्लाम से जुड़ा हुआ है, जो खाने के मामले में और उसमें भी खासकर मीट के मामले में तय करता है कि वो किस तरह से प्रोसेस किया हुआ हो. वहीं इससे विपरीत चीजें हराम की श्रेणी में आती हैं, जैसे शराब, पोर्क और वो सारा मीट जो हलाल की प्रक्रिया से न गुजरा हो.

हलाल एक अरेबिक शब्द है जिसका मतलब है जायज़ या वैध – सांकेतिक फोटो (pixabay)

लगभग सभी देशों में खाने की चीजों पर हलाल सर्टिफिकेशन के लिए अलग से कंपनियां होती हैं तो इस्लामिक देशों में सरकारी संस्थाएं ही ये काम करती हैं. बीते एक दशक से खाने की चीजों के अलावा दवाओं में भी हलाल सर्टिफिकेट मिल रहा है. ये इसलिए क्योंकि कंपनियां इसके लिए जानवरों या उनसे बने प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करती हैं. जैसे वैक्सीन को ही लें तो उसमें अगर पोर्क जिलेटिन का उपयोग हुआ हो तो निर्माता कंपनी को ये बताना होता है.

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अब कोरोना वैक्सीन को लेकर डर फैल गया है कि मुस्लिम या यहूदी इसका बहिष्कार न शुरू कर दें क्योंकि अगर ऐसा हो तो संक्रमण का खतरा बना ही रहेगा. यही कारण है कि विशेषज्ञ या तो जिलेटिन-फ्री टीका बनाने की कोशिश कर रहे हैं या फिर तर्कों से भी इस टीकाकरण को जायज ठहरा रहे हैं. इंडियन एक्सप्रेस में इजरायली विशेषज्ञ के रेबी डेविड स्टेव के हवाले से ये बात दिखती है. वे कहते हैं कि पोर्क को खाने की तरह लेना वर्जित है. अब वैक्सीन चूंकि इंजेक्शन के जरिए शरीर में जा रही है, न कि मुंह के रास्ते, लिहाजा वो हराम नहीं मानी जा सकती. खासकर बात अगर स्वास्थ्य की हो तो कुछ भी वर्जित नहीं.

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इसके बाद भी बड़ी आबादी वाले मुस्लिम देशों में इसे लेकर अफरा-तफरी दिख रही है. इंडोनेशिया इसमें सबसे आगे है. बता दें कि ये देश 225 मिलियन आबादी के साथ दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है. पहले भी वहां टीके को लेकर बवाल हो चुका है. साल 2018 में मीजल्स के टीके को इंडोनेशियाई उलेमा काउंसिल ने हराम कहा था क्योंकि उसमें जिलेटिन का उपयोग होता है.

पाकिस्तान में भी पोलियो के लिए सरकार को सख्ती करनी पड़ी- सांकेतिक फोटो (pixabay)

धार्मिक गुरुओं ने लोगों से उनके बच्चों को मीजल्स का टीका न दिलवाने की अपील करनी शुरू कर दी. इसके साथ ही वहां मीजल्स के मामले तेजी से बढ़े और अब हाल ये है कि इस बीमारी में इंडोनेशिया तीसरे नंबर पर आ चुका है. बाद में खुद मुस्लिम धर्मगुरुओं ने माना कि जिलेटिन मुंह के रास्ते भीतर नहीं जाता, लिहाजा जान बचाने के लिए टीका लिया जाना चाहिए, लेकिन तब तक लोगों में इसे लेकर भ्रम आ चुका था और हालत बिगड़ चुकी थी.

बता दें कि इंडोनेशिया में ज्यादातर दवाइयां दूसरे देशों से आयात की जाती हैं. पिछले महीने वहां पर चीन से कोरोना वैक्सीन की 12 लाख डोज आयात की गई है. अब वहां की सरकार को कोरोना वैक्सीन के खिलाफ फतवा जारी होने की आशंका है. मुस्लिम-बहुल देश मलेशिया में भी कमोबेश यही हाल था. तब अपील से काम न चलता देख वहां की सरकार ने सख्त नियम बनाए. वहां बच्चों के लिए अनिवार्य टीका न दिलवाने पर पेरेंट्स के लिए सजाओं का प्रावधान है. पाकिस्तान में भी पोलियो के लिए सरकार को सख्ती करनी पड़ी. वहां पर भी टीके को हराम की तरह देखा गया और नतीजा ये हुआ कि पोलियो कार्यक्रम पाकिस्तान में बुरी तरह से असफल रहा.

इधर खाने या दवाओं में धार्मिक भेद को खत्म करने के लिए कई देशों जैसे स्वीडन, नॉर्वे, आइसलैंड, डेनमार्क और स्लोनवाकिया ने एक कदम उठाया. इसके तहत हलाल या कोशर जैसा कोई सर्टिफिकेट नहीं मिलता है.


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