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क्या कोरोना-काल स्कूल जाती लड़कियों को कई दशक पीछे धकेलने वाला साबित होगा? | – News in Hindi

कोविड-19 के कारण स्कूल बंद होने से सभी बच्चों ने सीखने के मौके गंवाए, लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की लड़कियों पर इसका असर सबसे ज्यादा पड़ा है. इस समस्या की गहराई और बालिकाओं को होने वाले नुकसान का ठीक-ठीक अंदाजा लगाने के लिए हमें इसे एक-दूसरे में गुंथे हुए कई संदर्भों में देखने की जरूरत है.

सबसे पहले तो हमें यह ध्यान में रखना होगा कि लगभग सभी संस्कृतियों में धर्म की मदद से स्त्रियों के लिए अपने स्वयं के विकास के, समाज में भागीदारी के और आत्म-निर्णय के अवसरों को सीमित किया गया है. अभी भी शायद ही कोई समाज ऐसा हो जहां उनके काम का मूल्य आंकने में और पारिवारिक और सामाजिक जीवन को प्रभावित में उन्हें बराबरी मिलती हो. सदियों से चले आ रहे इस अबलीकरण का नतीजा महिलाओं के विकास पर दिखा. इससे उनका सामाजिक प्रभाव तो सीमित हुआ ही, आर्थिक तौर पर भी वे प्रभावित हुईं. अब शिक्षा एक ऐसा साधन है, जो उन्हें बराबरी के अवसरों के लिए संघर्ष करने लायक बना सकने में काफी अहम है. यही वजह है कि पढ़ाई का महत्व पुरुषों की बजाए महिलाओं के लिए कहीं ज्यादा है. यह एक तरह से माइनस से सामान्य तापमान पर आने और फिर आगे की ओर बढ़ने की प्रक्रिया होगी.

हम जानते हैं कि स्कूलों में नाम दर्ज कराने से लेकर रोजाना स्कूल जाने या पढ़ाई पूरी करने के सभी मानदंडों में समाज के कमजोर तबके की, और खासकर ग्रामीण इलाके की लड़कियां, लड़कों से कहीं पीछे हैं. जबकि ये बात भी उतनी ही सही है कि जब भी मौका मिलता है, वहां लड़कियां सीखने और परीक्षा में खुद को साबित करने में लड़कों से कहीं बेहतर दिखी हैं. यानी कुल मिलाकर उनके पीछे रहने का कारण उनकी कोई कमजोरी नहीं, बल्कि समाज और अवसरों में कमी है.

कोरोना काल में लड़कियों की पढ़ाई पर असर को हमें इसी पृष्ठभूमि में समझना होगा. जैसे जब भी कोई मुसीबत आती है, फिर चाहे वो प्राकृतिक हो या फिर मानव-जन्य, सबसे ज्यादा नुकसान कमजोर तबके का ही होता है. इस तरह से देखा जाए तो कोरोना के कारण पढ़ाई का नुकसान भी गरीबी के अनुपात में अधिक हुआ है. इससे आगे देखा जाए तो गरीब घरों में भी लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की पढ़ाई ज्यादा प्रभावित हुई. इस संदर्भ में लड़के-लड़कियों में अंतर के कई कारण हैं.

सबसे ज्यादा असर गैर-संपन्न ग्रामीण बालिकाओं पर
मिसाल के तौर पर अगर हम तीन सबसे अहम कारणों को देखें तो पाएंगे कि सबसे पहला कारण तो है, स्कूल न जा पाना. महामारी के कारण स्कूल जाने के मौके तो सभी बच्चों के खत्म हो गए हैं. चाहे वो अमीर हों या फिर गरीब, शहरी हों या ग्रामीण. लेकिन स्कूल न जा पाने का सबसे ज्यादा असर गैर-संपन्न ग्रामीण बालिकाओं पर हुआ है.

वजह ये है कि स्कूल जाने पर वे घरेलू कामों और माहौल से दूर कम से कम 5-6 घंटों के लिए रहती थीं. ये समय उनके मानसिक और व्यक्तित्व विकास में काफी जरूरी थे. इसी समय में वे दुनिया को समझने, बाहरी दुनिया में झांकने के मौके निकाल पाती थीं. इस समय में ही वे अपने सहपाठियों के साथ सहज और अनौपचारिक संवाद कायम कर पातीं या खेल-कूद पाती थीं. यही अनुभव उन्हें घर के अनुभवों को बाहरी दुनिया से जोड़ने में और समझने में मदद करते रहे. इस समय का उनकी सोच के अलावा चारित्रिक और व्यक्तित्व के विकास पर भी सकारात्मक असर होता था. अब कोरोना के साथ-साथ वो अवसर अनिश्चितकाल के लिए खत्म हो गया.अब तर्क ये आता है कि स्कूल तो लड़कों के लिए भी बंद हैं तो लड़कियों के लिए ही हाय-तौबा क्यों की जाए! तो बात ये है कि यहां समस्या केवल औपचारिक शिक्षा के बंद हो जाने की नहीं, बल्कि घर से बाहर लोगों से मिलने-जुलने के मौकों की भी है. लड़कों के पास ये अवसर लड़कियों से कहीं ज्यादा होते हैं, इसलिए उनके लिए ये नुकसान अपेक्षाकृत कम है.

लड़कियों को लड़कों की तुलना में घर पर पढ़ाई का मौका भी कम मिलता है. अधिकतर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में लड़कियों के पास घर पर खाली समय लड़कों की तुलना में कहीं कम होता है. अगर वे घर पर हैं तो घरेलू कामों में हाथ बंटाना उनके लिए अनिवार्य होता है. इस वजह से भले ही स्कूल ऑनलाइन पढ़ाई की बात कर रहे हों लेकिन फॉर्मल सेटअप के अभाव में लड़कियां बुरी तरह से प्रभावित हुई हैं.

लड़कियों के इस सांस्कृतिक जकड़न से छूटने के अवसर कम 
डिजिटल-संसाधनों की उपलब्धता भी लड़कियों के लिए कहीं कम है. फिलहाल स्कूल पूरी तरह से ई-लर्निंग अपना रहे हैं. वे डिजिटल तौर-तरीकों से पढ़ाते हैं और यहां तक कि परीक्षाएं भी ऑनलाइन ली जा रही हैं. इन सब में कंप्यूटर या स्मार्ट फोन की जरूरत होती है. साथ ही साथ बिजली और इंटरनेट कनेक्शन भी अनिवार्य हैं. सबसे पहले तो कोरोना के कारण रोजगार गंवा चुके लोगों के पास ये सारे साधन एक साथ होना मुश्किल है. और घर पर अगर एकाध स्मार्टफोन हो भी तो उसपर पहला हक लड़के का होता है. इस सामाजिक प्राथमिकता और गरीबी की पूरी मार लड़कियों पर पड़ती है.

लब्बोलुआब ये कि कोरोना महामारी ने लड़कियों की रफ्तार पर बड़ा ब्रेक लगा दिया है. साथ ही मुझे लगता है कि मौजूदा हालात भारतीय समाज में महिलाओं को त्याग की मूर्ति मानने वाली मानसिकता के लिए भी लड़कियों को तैयार करेंगे. ये ऐसी सामाजिक मान्यता है जो महिलाओं को ऊंचा आसन तो देती है लेकिन उनके हकों और सामर्थ्य पर कुठाराघात करके. और विडंबना है कि ये सब उनकी रजामंदी से होता है, फिर भले ही ये रजामंदी मतारोपण (indoctrination) और कंडीशनिंग (conditioning) से ही मिली हो. इस तरह से कोविड-19 के चलते लड़कियों के इस सांस्कृतिक जकड़न से छूटने के अवसर कम हुए हैं. (डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.)

ब्लॉगर के बारे में

रोहित धनकरप्रोफेसर,अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी

लेखक रोहित धनकर अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु में प्रोफेसर तथा दिगंतर, जयपुर के मानद सचिव हैं.

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