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कोरोना और राजनीति के धार्मिक उन्माद से बचने की जरूरत | – News in Hindi

ये सवाल अक्सर सिर उठाते रहे हैं कि भारतीय न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी क्यों है, उसके एक हाथ में तराजू और दूसरे हाथ में किताबें क्यों हैं? कुछ जगहों पर यह तस्वीर थोड़ी बदली रहती है. यानी आंखों पर पट्टी तो है, एक हाथ में तराजू भी है जबकि दूसरे में तलवार. सुप्रीम कोर्ट की रिपोर्टिंग करने वाले एक मित्र से मैंने कभी ये सवाल पूछे थे. उसने बताया था कि तलवार वाली तस्वीर तो भारतीय न्याय की देवी की नहीं है. भारतीय न्याय की देवी के एक हाथ में तराजू है जबकि दूसरे हाथ में किताबें. उसने कहा था कि तराजू के पलड़े किसी ओर झुके नहीं हैं, यह तराजू इस बात का प्रतीक है कि कोर्ट निष्पक्ष होता है. उसके दूसरे हाथ में किताबों का होना बताता है कि न्याय की देवी बुद्धि की पक्षधर है और उसी के आधार पर फैसले करती है. आंखों पर बंधी पट्टी का मतलब उसने समझाया था कि हमारी न्याय की देवी किसी भावनात्मक मुद्दे पर न उलझ जाए, इसलिए वह न तो वादी का चेहरा देखती है न प्रतिवादी का. वह सिर्फ तर्क सुनती है और बुद्धि-विवेक के आधार पर फैसले करती है. अपने उस रिपोर्टर साथी के ये तर्क मुझे जंचे थे.

इस कोरोना काल में उस साथी के तर्क और कोर्ट के फैसले के रुख में मुझे बेहद समानता दिखी. कोर्ट ने वैसे तमाम पर्व-त्योहार के आयोजनों पर सख्ती दिखाई है, जिन्हें सामूहिक रूप से मिलकर मनाए जाने की परंपरा रही है. ताजा उदाहरण दिल्ली हाई कोर्ट में छठ को लेकर डाली गई याचिका पर आया फैसला है. कोरोना वायरस संक्रमण के बढ़ते केस को देखते हुए दिल्ली में सार्वजनिक मंदिर, घाट और मैदानों में छठ पूजा की अनुमति दिए जाने से दिल्ली हाई कोर्ट ने इनकार कर दिया है. एक याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा है कि त्योहार के लिए जिंदा रहना जरूरी है. गौरतलब है कि दिल्ली सरकार ने सार्वजनिक जगहों पर छठ पूजा करने की अनुमति नहीं दी है. इसके बाद पूजा की अनुमति के लिए हाई कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई थी.

पर झारखंड में क्या हुआ? वहां सरकार ने महापर्व छठ को लेकर पाबंदियां लगाई थीं. पर सरकार की ओर से जारी गाइडलाइंस में सीएम हेमंत सोरेन को छूट देने की बात कहनी पड़ी. प्रोजेक्ट बिल्डिंग में हेमंत सोरेन ने कहा कि नदी घाटों पर लोग सोशल डिस्टेंसिंग के साथ छठ मना सकते हैं. हालांकि मुख्यमंत्री ने आमलोगों से अपील करते हुए कहा कि कोरोना संक्रमण को देखते हुए इस बार लोग अपने घरों में ही छठ मनाएं. सीएम ने कहा कि संक्रमण अभी कम नहीं हुआ है, लिहाजा लोगों को सावधानी बरतने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार की गाइडलाइंस केंद्र सरकार की भावनाओं के अनुरूप ही जारी की गई है. मुख्यमंत्री ने पीएम मोदी की अपील का हवाला देते हुए कहा कि जब तक दवाई नहीं तब तक ढिलाई नहीं का फार्मूला राज्य सरकार अपने प्रदेश में लागू करेगी.

पर ऐसा नहीं हो सका. ऐसा न हो पाने की वजह क्या रही? दरअसल, झारखंड में राजनीतिक पार्टियों ने सरकार पर गैरजरूरी दबाव बनाया. उसने धर्म की राजनीति कर लोगों को उकसाया. झारखंड की कई संस्थाएं भी इस बहकावे में आईं. सबने सरकार के फैसले का विरोध किया. गाइडलाइंस पर फिर से विचार करने की बात कही. और ऐसे में झारखंड की सरकार को झुकना पड़ा.

ऐसे में डॉ. राममनोहर लोहिया याद आते हैं. उन्होंने कहा था ‘धर्म एक दीर्घकालीन राजनीति है एवं राजनीति एक अल्पकालीन धर्म है.’ राममनोहर लोहिया के इस वक्तव्य की गहराई में जाने की जरूरत है. उन्होंने किसी हाल में धर्म की राजनीति करने की बात नहीं कही थी. उन्होंने यह समझाने की कोशिश की थी कि धर्म की राजनीति तो लंबी चल सकती है, और उससे चंद लोगों के तात्कालिक हित भले सध जाएं, लेकिन उससे समाज और देश का हित नहीं सधने वाला. उनका मानना था कि राजनीति का धर्म निभाना बहुत मुश्किल काम है. इसलिए उसे लंबे समय तक हमारे नेता साध नहीं पाते.

यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जो धर्म की राजनीति का शिकार है. आपको याद होगा कि ‘हेगेल’ के दर्शन की आलोचना के रूप में लिखे गए लेख में कार्ल मार्क्स ने कहा था – ‘धार्मिक संकट एक ही समय में असल संकट की अभिव्यक्ति भी है और विरोध भी. धर्म उत्पीड़ित प्राणी का उच्छ्वास है, एक हृदय-विहीन दुनिया का हृदय है, आत्माहीनों की आत्मा है. यह जनता की अफीम है.’

कार्ल मार्क्स ने जब धर्म को अफीम बताया था तो उनका मकसद धर्म को अफीम का नशा बताना नहीं था. बल्कि उन्होंने अफीम शब्द का इस्तेमाल दर्दनाशक के रूप में देखा था. वे मानते थे कि लुटे-पिटे लोगों की आस्था अगर धर्म के प्रति है तो वह धर्म प्रेशर कुकर के वेंट की तरह काम करता है. यानी हमारे भीतर के तमाम दर्द और दुख को सहने और नजरअंदाज करने की ताकत देता है, हमारा ध्यान हमारी तकलीफों से हटाकर एक खुशनुमा भ्रम पैदा करता है. इस तरह हमारा दर्द भी खत्म होता है और हम आशावान बने रहते हैं. हममें जीवन की गति बनी रहती है.पर यह हमारे वक्त का दुर्भाग्य है कि वह धर्म अब दर्दनाशक का काम नहीं कर रहा. उस अफीम का डोज इतना बढ़ चुका है कि हम लगभग नशे में हैं. हमें न कोरोना का भय है, न हम उसके प्रति सजग हैं. हम बस सिर्फ अपनी आस्था के साथ हैं. इस आस्था की लाठी के सहारे जो चाहे, जब चाहे, जिधर चाहे हमें हांक सकता है. हम अपने नशे में डूबे सिर्फ एक खूबसूरत काल्पनिक अंत की ओर दौड़ रहे हैं, हकीकत से आंखें मूंद बैठे हैं.

हम ईद बाजार की गहमागहमी भूल चुके हैं. दशहरे के वक्त की भीड़ हमें याद नहीं. दीपावली के बाजारों की चमक-दमक के बीच उमड़ी भीड़ से हम कोई सबक सीखने को तैयार नहीं. हम कोरोना संक्रमण के उन भयावह आंकड़ों को भी देखने को तैयार नहीं जिनका ग्राफ इन पर्वों के बाद तेजी से बढ़ा.

हम रट्टू तोता की तरह जाल में फंसने के बाद भी दोहरा रहे हैं – शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, लोभ से उसमें फंसना नहीं. हम लगातार फंसते जा रहे हैं और मस्ती में गुनगुनाते भी जा रहे हैं. प्रकृति पूजा का महापर्व मनाने के नाम पर हम सरकार को झुका सकते हैं, पर अपनी आस्था के साथ कोई समझौता करने को तैयार नहीं.

इस महापर्व के बीत जाने के बाद भी संभलने का मौका हमारे पास हो सकता है. बस गुजारिश इतनी है कि पूर्वोत्तर भारत के इस महापर्व पर हमने सोशल डिस्टेंसिंग कितनी बरती, कोरोना गाइडलाइंस का पालन कितना किया – यह याद रख लें. साथ ही यह भी याद रखें कि इस महापर्व के नाम पर जिसने अपनी राजनीति की रोटियां सेंकी, वह महापर्व के बाद उपजी तकलीफ में हमारे साथ कितना है? (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)


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