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किस वजह से Oxford यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट बीफ बैन की वकालत कर रहे हैं?

ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी (University of Oxford) में स्टूडेंट्स ने हाल ही में कॉलेज कैंटीन में बीफ और दूसरे तरह के रेड मीट पर रोक लगाने के लिए वोट किया. इसमें दो-तिहाई स्टूडेंट्स ने बैन के समर्थन में वोट किया. उनका तर्क है कि वे यह कदम पर्यावरण के हित में उठा रहे हैं. जानिए, क्या है पूरा मामला और बीफ बैन से कैसे ग्लोबल वॉर्मिंग (beef ban can decrease global warming) कम की जा सकती है.

ब्रिटेन के लगभग सारे कॉलेजों में इन दिनों शाकाहार को बढ़ाना दिया जा रहा है. ये कदम कॉलेज प्रशासन नहीं, बल्कि स्टूडेंट्स खुद ले रहे हैं. इसी क्रम में यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी और गोल्डस्मिथ यूनिवर्सिटी ने अपने कैंपस में बीफ मिलने पर रोक लगा दी. इसके बाद ही ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट यूनियन ने भी इस दिशा में कदम उठाया. हालांकि फिलहाल पूरी तरह से बैन की बात नहीं हो सकी है, और इस बारे में प्रशासन से चर्चा बाकी है.

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स्टूडेंट्स का कहना है कि बीफ या रेड मीट खाने से क्लाइमेंट चेंज और ग्लोबल वॉर्मिंग को बढ़ावा मिलता है. ऐसे में जरूरी है कि यूनिवर्सिटी खुद इस बारे में पहल करे. यूनिवर्सिटी के 22 हजार छात्रों के संगठन ने ये मांग की. डेली मेल की खबर के मुताबिक स्टूडेंट यूनियन का ये प्रस्ताव यूनिवर्सिटी मैनेजमेंट के पास भेज दिया गया है. इस पर आखिरी फैसला मैनेजमेंट का ही होगा क्योंकि पॉलिसी में बदलाव की ताकत स्टूडेंट यूनियन के पास नहीं है.

ब्रिटेन के लगभग सारे कॉलेजों में इन दिनों शाकाहार को बढ़ावा दिया जा रहा है- सांकेतिक फोटो (Pixabay)

अब ये समझते हैं कि बीफ पर रोक लगाना कैसे पर्यावरण के हित में होगा. ये बहस कई सालों से चल रही है. पर्यावरण के जानकारों का मत है कि मांसाहार ग्लोबल वॉर्मिंग की बड़ी वजह बन चुका है. इसका कारण है मीट की पर्याप्त आपूर्ति के लिए ज्यादा से ज्यादा मवेशियों को पाला जाना. ये जुगाली के दौरान काफी मात्रा में ग्रीनहाउस गैस निकालते हैं. ये वो गैस है जो सूरज की गरमाहट सोखती है और धरती को लगातार गर्म करती जाती है.

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एक मोटा-मोटी अनुमान कहता है कि दुनिया की कुल ग्रीनहाउस गैसों में से 14 प्रतिशत का उत्सर्जन पालतू पशुओं जैसे गाय, भैंस, बैल और भेड़-बकरियों की वजह से होता है. इसके अलावा बीफ उत्पादन के लिए अलग-अलग चरण में बहुत ज्यादा मात्रा में पानी की जरूरत होती है. गाय के लिए एक टन चारा तैयार करने में औसतन 1,62,59,000 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है. यानी पानी की भी भरपूर बर्बादी हो रही है. ऐसे में अगर आप मीट की आधी मात्रा खाते हैं तो इसका नतीजा होगा कि आप पानी की आधी मात्रा का ही इस्तेमाल करेंगे. इस कदम से दुनिया को बेहतर इस्तेमाल के लिए काफी ज्यादा पानी उपलब्ध होगा जो जरूरी खाद्यान्न संसाधन के उगाने में मददगार होगा

पोषण के लिहाज से देखें तो मीट खाए बगैर भी पूरा पोषण मिल सकता है- सांकेतिक फोटो (Pixabay)

पोषण के लिहाज से भी देखें तो मीट खाए बगैर भी पूरा पोषण मिल सकता है. बता दें कि जानवरों से मिलने वाले मांस, अंडा और दूध जैसे खाद्य उत्पाद वैश्विक प्रोटीन की आपूर्ति में सिर्फ 37 प्रतिशत का योगदान देते हैं. यानी बाकी हिस्सा शाकाहार से ही पूरा होता है. U.S. Dietary Guidelines Advisory committee की सदस्य Linda Van Horn कहती हैं, मांसाहार की बजाए हमें प्लांट-बेस्ड डायट लेनी चाहिए. जैसे सूखे मेवे, मूंगफली, चना, बीन्स और मटर जैसी चीजें मांस से मिलने वाले प्रोटीन की तरह ही शरीर को पूरा पोषण दे सकती हैं.

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मांसाहार के कारण कई तरह की संक्रामक बीमारियों का डर भी हाल में बढ़ा है. इसे ही टालने के लिए और खासतौर पर क्लाइमेंट चेंज रोकने के लिए स्टूडेंट ही नहीं, दुनियाभर के देश अपनी तरह से शाकाहार को प्रमोट कर रहे हैं. इसके तहत सीधे-सीधे बीफ या मीट बैन पर बात नहीं होती, बल्कि शाकाहार के फायदे गिनाए जाते हैं. गूगल ट्रेंड्स का सर्च डाटा कहता है कि साल 2014 से 2018 के बीच दुनियाभर में असरदार तरीके से शाकाहार की ओर लोगों का रुझान बढा है. इजराइल, आस्ट्रेलिया, आस्ट्रिया, कनाडा और न्यूजीलैंड में शाकाहारी बढ़ रहे हैं.

फ्रैंड्स ऑन अर्थ नामक संस्था के मुताबिक दुनियाभर में 50 करोड़ लोग ऐसे हैं जो पूरी तरह से शाकाहारी हैं लेकिन तादाद बढ़ रही है. माना जा रहा है कि वर्ष 2018 में शाकाहार के प्रति सबसे ज्यादा ट्रेंड देखा गया है लिहाजा साल 2020 में शाकाहारियों की तादाद भी और बढ़ी हुई मानी जा सकती है.


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