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किसान आंदोलन: हल तो बातचीत से ही निकल सकेगा, पर बातचीत कराए कौन? | – News in Hindi

ज्‍यों-ज्‍यों किसान आंदोलन लंबा खिंच रहा है यह मामला सुलझने के बजाय और उलझता जा रहा है. किसान संगठनों की ओर से 8 दिसंबर को किए गए भारत बंद और 14 दिसंबर को किए गए अनशन व चक्‍का जाम जैसे कदमों के बाद भी मामले में कोई प्रगति नहीं हुई है. एक तरफ किसान अपनी इस मांग पर अड़े हैं कि सरकार तीनों कृषि कानून वापस ले, वहीं सरकार अपने इस रुख पर कायम है कि वह किसानों की मांग पर विचार करते हुए कानूनों में जरूरी संशोधन करने को तो तैयार है लेकिन बिल वापस नहीं लिये जाएंगे.

इस मामले ने अब नया मोड़ ले लिया है.जिस तरह किसान सड़क पर आकर अपनी बात कह रहे हैं, उसी तरह सरकार और सत्‍तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने भी लोगों के बीच जाकर कृषि बिलों के पक्ष में बात करनी शुरू कर दी है. प्रधानमंत्री से लेकर केंद्रीय मंत्रियों और भाजपा शासित राज्‍यों के मुख्‍यमंत्री से लेकर मंत्रियों तक के अलावा भाजपा संगठन के तमाम वरिष्‍ठ नेता जिलों जिलों में जाकर सभाएं कर रहे हैं और लोगों को बता रहे हैं कि नए कानून किसानों के खिलाफ नहीं बल्कि उनके हित में हैं.

किसान आंदोलन का मध्‍यप्रदेश से बहुत खास रिश्‍ता है. यह इसलिए कि इस समय देश के कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर मध्‍यप्रदेश से ही हैं और मुरैना से लोकसभा के सांसद हैं. वे आंदोलन को खत्‍म करने के लिए किसान संगठनों से कई दौर की बातचीत कर चुके हैं. यह बात अलग है कि बातचीत का नतीजा कुछ नहीं निकला है. दूसरी तरफ किसान आंदोलन से जुड़े संगठनों में एक प्रमुख संगठन भारतीय किसान मजदूर संघ भी है जिसके नेता शिवकुमार शर्मा ‘कक्‍काजी’ हैं. कक्‍काजी भी मध्‍यप्रदेश के होशंगाबाद जिले से हैं.

किसानों की मांगों को लेकर करीब एक दशक पहले मुख्‍यमंत्री निवास का घेराव कर, मध्‍यप्रदेश की राजधानी भोपाल को जाम कर चुके कक्‍काजी राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ से जुड़े किसान संगठन भारतीय किसान संघ की मध्‍यप्रदेश इकाई के अध्‍यक्ष भी रहे हैं लेकिन अब वे सरकार के खिलाफ सड़कों पर हैं.यानी वर्तमान किसान आंदोलन में मध्‍यप्रदेश का प्रतिनिधित्‍व दोनों तरफ से हो रहा है, सरकार की ओर से भी और किसानों की ओर से भी.

दरअसल यह मामला अब किसानों की मांग और उसके समाधान से अलग हटकर दूसरा मोड़ लेता जा रहा है. आंदोलन में देश विरोधी ताकतों का हाथ होने, इसके जरिये खालिस्‍तान की मांग को फिर से उठाने, आंदोलनकारियों द्वारा कथित टुकड़े टुकड़े गैंग को समर्थन देने जैसे आरोप के बाद सत्‍तारूढ़ दल के नेताओं की ओर से एक बड़ा बयान आया है. इस बयान जरिये भाजपा ने एक बार फिर समस्‍या के समाधान के लिए मोदी कार्ड चला है.

किसान आंदोलन को लेकर जनता के बीच जाने के भाजपा के अभियान के तहत केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्रसिंह तोमर ने बुधवार को ग्‍वालियर में किसानों की एक बड़ी सभा को संबोधित करते हुए कहा कि कोई भी यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को धूमिल करने का प्रयास करेगा तो सरकार जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है. तीनों कानूनों को किसानों के हित में बताते हुए तोमर बोले कि जब तक कानूनों में बदलाव नहीं होगा, जंजीरें नहीं टूटेंगी, तब तक किसानों को लाभ नहीं मिल सकता. हमारा नेता पवित्र है, सरकार की नीयत पवित्र है.हम सिर झुकाकर किसानों से बात करने को तैयार हैं, लेकिन मोदी सरकार को झुकाने का प्रयास किया जा रहा है.

यानी जो भाजपा अब तक आमतौर पर चुनाव जीतने के लिए मोदी कार्ड का इस्‍तेमाल करती आई थी उसने इस बार एक जन आंदोलन से निपटने के लिए मोदी कार्ड का इस्‍तेमाल किया है. किसानों के विरोध के सामने मोदी की छवि को खड़ा करके भाजपा देश में इस मुद्दे पर जनमत को अपने पक्ष में जुटाने की रणनीति अपना रही है.यह एक तरह से ऐसा बताने की कोशिश है कि किसान आंदोलन दरअसल किसानों के पक्ष में नहीं बल्कि मोदी के खिलाफ है. भाजपा का यह कदम देश में बहुत लंबे समय बाद किसी जनआंदोलन से लड़ने के लिए सरकार के मुखिया की छवि को इस्‍तेमाल करने का गवाह बनने जा रहा है.

भाजपा अपनी इस रणनीति में कितनी कामयाब होती है अभी नहीं कहा जा सकता. लेकिन इस पूरे परिदृश्‍य ने एक बात को बहुत शिद्दत से रेखांकित किया है और वो है सत्‍तारूढ़ दल के पास ट्रैक-टू यानी समानांतर रणनीति को अंजाम देने वालों की कमी. जब भी इस तरह के बड़े आंदोलन होते हैं और वे बगैर किसी समाधान के लंबा खिंचने लगते हैं तो फिर बात सरकार की ताकत से नहीं बातचीत से ही बनती है.

एक समय था जब भाजपा के पास इसके लिए प्रमोद महाजन जैसे नेता हुआ करते थे. प्रमोद महाजन की असमय मौत के बाद एक वैक्‍यूम आया जिसे बाद में सुषमा स्‍वराज और अरुण जेटली जैसे नेताओं ने भरा.जब तक सुषमा स्‍वराज और जेटली जैसे नेता रहे तब तक चाहे संसद का फ्लोर मैनेजमेंट हो या फिर संसद से बाहर मैदानी रणनीति को अंजाम देने या किसी संकट से निपटने का मामला, भाजपा को रास्‍ता मिलता रहा.पर आज की सत्‍ता और संगठन व्‍यवस्‍था में ऐसे सारे चैनलों और ट्रैक-टू संवाद के लिए कोई जगह नहीं बची है. सारे सूत्रों के केंद्रीकरण ने इन हालात को और जटिल बनाया है.

किसान आंदोलन में भी यह साफ दिखाई दे रहा है कि सरकार और संगठन के पास ऐसा कोई नेता नहीं है जिसके दूसरे पक्ष में भी सक्रिय संपर्क हों और जो दूसरे पक्ष को मान मनौवल के साथ समझाबुझाकर बातचीत की टेबल पर लाकर मामले का कोई संतोषजनक हल निकलवा सके.

इस मामले में किसानों से पहले बातचीत कृषि मंत्री नरेंद्रसिंह तोमर और वाणिज्‍य एवं उद्योग आदि विभागों के मंत्री पीयूष गोयल ने की.कोई नतीजा न निकलता देख भाजपा के संकटमोचक और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को आगे आना पड़ा, लेकिन इस बार उनका हस्‍तक्षेप भी कोई काम नहीं आ सका. ताज्‍जुब है कि मामला इतना उलझ जाने के बाद भी राजनाथसिंह या नितिन गडकरी जैसे अनुभवी नेता कहीं सक्रिय भूमिका में नहीं है.

दूसरी ओर विपक्ष के साथ भाजपा के रिश्‍ते बहुत ही खराब हो चले हैं, दूसरे शब्‍दों में कहें तो वे दुश्‍मनी की हद तक जा पहुंचे हैं. इसलिए यह अपेक्षा करना कि इस मामले में भाजपा को बाकी राजनीतिक दलों से कोई सहयोग मिलेगा बेमानी ही होगा.

कांग्रेस और वामपंथी दलों जैसे चिर विरोधी दलों की बात छोड़ भी दें तो खुद एक समय भाजपा के पुराने सहयोगी रहे शिवसेना और अकाली दल जैसे दल भी आज उससे छिटक कर दूर जा खड़े हुए हैं. वर्तमान किसान आंदोलन में तो अकाली दल की बहुत महत्‍वपूर्ण भूमिका है.खुद प्रकाशसिंह बादल ने इस आंदोलन का समर्थन करते हुए अपना पद्म सम्‍मान लौटा दिया है. दूसरी तरफ चाहे उत्‍तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी हो या फिर तेलंगाना में टीआएस या फिर बंगाल में ममता की तृणमूल कांग्रेस सभी इस मामले में भाजपा को पटखनी देने का अवसर खोज रहे हैं.

ऐसे मौकों पर अकसर दूसरा चैनल मैदानी संगठनों का होता है.कई बार ऐसे संगठन आंदोलन से जुड़ने और अलग होने की भूमिका निभाकर सरकारों को सहयोग देते रहे हैं.यदि वे ऐसा नहीं भी करते तो भी आंदोलन के अडि़यल रुख को मोड़ने और दोनों पक्षों को बातचीत की टेबल तक लाने में उनकी अहम भूमिका होती है,

लेकिन ताजा मामले में ऐसा कोई भी संगठन नहीं दिख रहा जो दोनों ही तरीकों से आंदोलन को खत्‍म कराने में प्रभावी भूमिका निभा सके.औरों की बात तो छोड़ दें, खुद राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ से संबंध रखने वाले भारतीय किसान संघ और स्‍वदेशी जागरण मंच जैसे संगठनों ने किसान आंदोलन का साथ भले न दिया हो लेकिन आंदोलनकारियों की ओर से उठाए गए कई मुद्दों पर सहमति जरूर जताई है.

इस सारी उठापटक के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है लेकिन फिलहाल कोई हल निकलता नजर नहीं आ रहा. हल निकलने की एक ही सूरत है और वो ये कि दोनों पक्ष संवाद की ओर लौटें.अपनी अपनी बात पर अड़े रहने के बजाय लचीला रुख अपनाएं. ऐसा रास्‍ता खोजें जिससे दोनों का मान रह जाए.पर सवाल ये है कि दोनों पक्षों को सार्थक और समझौतापरक बातचीत की टेबल पर लाए कौन? और यही सवाल इन दिनों सरकार की सबसे बड़ी मुसीबत बना हुआ है.

ब्लॉगर के बारे में

गिरीश उपाध्यायपत्रकार, लेखक

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. नई दुनिया के संपादक रह चुके हैं.

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