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किन वजहों से मुंबई कोरोना से जीत की ओर, दिल्ली में बढ़ते जा रहे केस

नई दिल्ली/मुंबई. सर्द मौसम और प्रदूषण का असर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कोरोना के मामले पाए जाने पर पड़ रहा है. दिल्ली एक समय में दो हेल्थ इमरजेंसी का सामना कर रही है. एक ओर जहां प्रदूषण है तो वहीं कोरोना के बढ़ते मामले राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी असर डाल रहे हैं. फिलहाल दिल्ली की हालत ठीक उसी तरह लग रही है जैसे भारत में कोरोना के शुरुआती दिनों में मुंबई की थी. दोनों महानगरों को कोरोना ने बुरी तरह प्रभावित किया. एक ओर जहां मुंबई में स्थितियां ठीक हो रही हैं तो वहीं दिल्ली अभी भी बुरी तरह घिरा हुआ है.

25 जून को दिल्ली कोरोनावायरस के मामलों में मुंबई को पीछे कर दिया. इसकी सामान्य वजह है कि मुंबई में कोविड के मामले नियंत्रित हुए जबकि दिल्ली में नए मामलों में तेजी जारी है. मुंबई लगभग पांच महीने तक कोविड हॉटस्पॉट बना रहा. लेकिन एशिया की सबसे बड़े स्लम एरिया धारावी में कोरोना नियंत्रित होने के साथ ही आज पूरी मुंबई में हालत सुधार के स्तर पर हैं और यह रोल मॉडल की तरह पेश किया जा रहा है.

दूसरी ओर, दिल्ली अभी भी मामलों की बढ़ती संख्या को नियंत्रित करने के तरीकों पर तैयारी चल रही है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने हाल ही पार्शियल लॉकडाउन का सुझाव दिया है. मुंबई में एक्टिव केस की संख्या लगभग 11,000 है जबकि दिल्ली में यह लगभग 42,000 है.हालांकि मुंबई में कोविड से मरने वालों की संख्या दिल्ली की तुलना में लगभग 3,000 अधिक है.

Lockdown के नियमों में रहा अंतरविशेषज्ञों का मानना है कि महाराष्ट्र सरकार द्वारा त्योहारी सीजन में भी लॉकडाउन में ढील नहीं देने से परिस्थितियां और ज्यादा गंभीर नहीं हुई. विपक्ष के दबाव के बाद भी राज्य में स्कूल, धर्म स्थल, मॉल, सिनेमा हॉल , रेस्तरां और लोकल ट्रेन्स की परमिशन नहीं दी गई. इसके बजाय सरकार ने लॉकडाउन की नियमावली जारी कर दी. समारोहों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. ऐसा शायद पहली बार हुआ जब गणेशोत्सव के दौरान मुंबई ने इतना संयम दिखाया. सामूहिक दिवाली समारोह पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था. समुद्र तटों पर छठ पूजा की भी रोक लगा दी गई.

वहीं बात दिल्ली की करें तो यहां सरकार ने लॉकडाउन के नियमों में ढील दी. दिल्ली उन पहले शहरों में से एक था, जहां बाजार खुले और शराब की दुकानों पर प्रतिबंध भी हटा दिया. कोरोना के मामलों में आई हालिया बढ़ोतरी कुछ हद तक त्योहारी मौसम मे भीड़ और लोगों के इकट्ठा होने के चलते है.

दिल्ली मेकशिफ्ट कोविड हॉस्पिटल नहीं बना सकी!
कोरोना संक्रमण में जांच की अहम भूमिका है. मुंबई को शुरु में ही पता चल गया कि उनके  सामने बड़ी समस्या है. झुग्गियों में कोरोना की बढ़ती संख्या को नियंत्रित करना आसान नहीं था. महाराष्ट्र सरकार खास ध्यान जांच पर था. हालांकि दिल्ली सरकार के डेटा से पता चलता है कि दिल्ली ने मुंबई की तुलना में तीन गुणा ज्यादा सैंपल्स  की जांच की है.

अंग्रेजी पत्रिका इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार विशेषज्ञ स्वीकार करते हैं कि रैपिड एंटीजन टेस्ट (आरएटी) की संख्या दिल्ली में बहुत अधिक है. डेटा से पता चलता है कि दिल्ली द्वारा किए गए दो-तिहाई परीक्षण  एंटीजेन थे, जिन्हें आरटी-पीसीआर की तुलना में कम विश्वसनीय माना जाता है.

रिपोर्ट के अनुसार मुंबई में वर्ली, बीकेसी, गोरेगांव और दहिसर में कई मेगा कोविड हॉस्पिटल इस्टैबलिश हुए. गंभीर रोगियों के लिए अलग से हॉस्पिटल बने. यहां बेड्स की कुल संख्या 17,467 है, जिनमें से 12,329 उपलब्ध हैं. मुंबई के सार्वजनिक और निजी अस्पतालों में कुल बेड 14,462 हैं, जिनमें से 9,734 उपलब्ध हैं. वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय राजधानी को केंद्र और दिल्ली दोनों सरकारों से स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे का फायदा है फिर भी शहर आईसीयू बेड की पर्याप्त संख्या नहीं है. मुंबई के मुकाबले दिल्ली मेकशिफ्ट कोविड हॉस्पिटल नहीं बना सकी.


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