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अमेरिका का दोबारा जुड़ना WHO के लिए किस तरह से फायदेमंद होगा?

WHO दुनियाभर के सेहत से जुड़े प्रोग्राम का हिस्सा बनता है- सांकेतिक फोटो

नवनिर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन (Joe Biden) ने संकेत दिया है कि वे सत्ता संभालने के साथ वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) से जुड़ जाएंगे. इसी साल अप्रैल में मौजूदा राष्ट्रपति ट्रंप ने देश को WHO से अलग कर लिया था. ट्रंप का आरोप था कि संगठन ने चीन के प्रभाव में आकर कोरोना वायरस के बारे में दुनिया को जल्दी आगाह नहीं किया. अमेरिका के हाथ खींचने पर संगठन ने फंडिंग की कमी की बात भी कही थी. जानिए, WHO की फंडिंग में अमेरिका और दूसरे देशों का क्या रोल रहा है.

इसे बहुत से देशों, फिलेंथ्रापिक संगठनों और यूएन से काफी पैसे मिलते हैं. WHO की आधिकारिक साइट में इस बारे में जानकारी भी दी गई है. इसके मुताबिक उसे अमेरिका और दूसरे सदस्य देशों से 35.41% फंड आता है. जनहित में काम करने वाली संस्थाएं 9.33% देती हैं, जबकि 8.1% यूएन संस्थाएं देती हैं. इसके अलावा फंडिंग का एक और जरिया भी है, जिसे assessed contribution कहते हैं. ये वे पैसे हैं जो बहुत से देश WHO की सदस्यता पाने के लिए देते हैं. ये हर देश अपनी जनसंख्या और जीडीपी के हिसाब से देते हैं.

अमेरिका के विश्व स्वास्थ्य संगठन से अपने संबंध तोड़ने पर संगठन को भारी धक्का लगा था सांकेतिक फोटो (Pixabay)

अमेरिका से आते रहे सबसे ज्यादा पैसेअमेरिका वॉलेंटरी कंट्रीब्यूशन के तहत फंडिंग का सबसे बड़ा हिस्सा, लगभग 15 प्रतिशत देता रहा. है. यही कारण है कि अमेरिका के विश्व स्वास्थ्य संगठन से अपने संबंध तोड़ने पर संगठन को भारी धक्का लगा था और उसने बार-बार कहा था कि महामारी के दौर में इस तरह से हाथ खींचना ठीक नहीं.

फंड का WHO क्या करता है
संगठन दुनियाभर के सेहत से जुड़े प्रोग्राम का हिस्सा बनता है. जैसे साल 2018-19 में लगभग 1 अरब डॉलर पोलियो खत्म करने में लगाए गए थे. ये संगठन की कुल फंडिंग का लगभग 19 प्रतिशत था. 8.77% डॉलर पोषण के कार्यक्रम को दिए गए. टीकाकरण के लिए 7% फंड लगाया गया. अफ्रीकन देशों को WHO की ओर से 1.6 अरब डॉलर दिया गया ताकि वे अपने यहां बीमारियों पर काम कर सकें. साथ ही दक्षिण पूर्वी एशिया को 375 मिलियन डॉलर दिए गए. भारत भी इसी का हिस्सा था. अमेरिका को इससे 62.2 अरब डॉलर दिए गए.

खर्च की प्राथमिकता कैसे तय होती है

सालभर कहां-कहां और कितना खर्च होगा, ये World Health Assembly तय करती है जो संगठन का फैसला लेने वाली संस्था है. तय करने के दौरान एक मीटिंग होती है, जिसमें सदस्य देशों के प्रतिनिधि हिस्सा लेते हैं. जिनेवा में हर साल ये प्रक्रिया होती है, जहां संगठन के डायरेक्टर जनरल का हेडक्वार्टर भी होता है. कौन से देश को कितने पैसे मिलेंगे, ये उसकी हालत और जरूरत पर तय होते हैं. गरीब देशों को संक्रामक बीमारियों के लिए फंडिंग इसका खास मकसद है.

किसी हेल्थ इमरजेंसी के लिए तैयार होना भी WHO के काम हिस्सा है- सांकेतिक फोटो (Pixabay)

हमारे यहां WHO क्या करता है
12 जनवरी 1948 को हम इसके सदस्य बने थे. 2019 से लेकर अगले 5 सालों के लिए Country Cooperation Strategy (CCS) पहले ही तैयार है, जिसे हेल्थ मिनिस्ट्री और भारत में WHO के ऑफिस ने मिलकर तय किया है. खुद WHO के ही अनुसार यहां पर नॉन कम्युनिकेबल बीमारियों जैसे दिल की बीमारी, कैंसर, डायबिटीज जैसी बीमारियों पर काम हो रहा है. साथ ही वायु प्रदूषण कम करने और मानसिक सेहत पर भी काम किया जा रहा है. संगठन का इरादा है कि इन सारे एरिया पर काम को सरकारी और गैर सरकारी संगठनों के साथ मिलकर और आगे बढ़ाया जाए. देश के लिए रणनीति के तहत किसी हेल्थ इमरजेंसी के लिए तैयार होना भी एक हिस्सा है.

अब बाइडन ने कहा है कि उनका प्रशासन पहले रोज से ही WHO के साथ वापस काम शुरू कर देगा. हालांकि चीन से इसकी मिलीभगत के बारे में कोई टिप्पणी न करते हुए बाइडन ने कहा कि चीन को नियमों का पालन करना होगा और उसी तरह से काम करना होगा. बता दें कि चुनाव प्रचार के दौरान बाइडन ने भी चीन के प्रति आक्रामक रुख रखा था और लगातार उसे सजा देने की बात कहते आए थे.


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